Tuesday, April 30, 2013



              आज की ज्वलंत समस्या 'बलात्कार' के बारे में आप लोगों से अपने विचार बांटना, एक अध्यापिका होने के नाते  अपना नैतिक कर्तव्य समझती हूँ। उससे आप लोग सहमत हों या न हों यह आप लोगों का अपना दृष्टिकोण है।
सबसे पहले मैं यह कहना चाहती हूँ कि इस कुकृत्य से महिलायें शारीरिक से अधिक मानसिक रूप से प्रताड़ित होती हैं। यह तो भुक्त भोगी ही समझ सकता है, हम तो केवल कल्पना मात्र से ही आतंकित हो जाते हैं। संविधान ने पुरुषों और महिलाओं को बराबर के अधिकार  दिए हैं लेकिन जब हमारे शरीर पर ही हमारा पूरा अधिकार नहीं है तो बाकी के अधिकारों  की  क्या उपयोगिता है? भगवान ने  महिलाओं की शारीरिक संरचना ही  ऐसी की है। उसकी रक्षा के लिए हमेंबहुत बार   पुलिस और क़ानून की सहायता लेनी पड़ती है लेकिन यदि हम अपनी सीमाएं न लांघे तो शायद इसकी आवश्यकता ही ना पड़े। क्यों नहीं हम बचाव  का रास्ता अपनाकर ऐसे मौकों को निमंत्रण ही न दें। अपना पहनावा शालीनता पूर्वक पहनें।देर रात तक   बाहर ना रहें, और यदि कभी मजबूरी में रहना भी पड़े तो लौटने   के सही  साधन का प्रयोग करें। बच्चो! पिछले दिनों महिलाओं ने ' दामिनी' के केस में नारेबाजी करके पुरुषों के लिए  यह दलील दी कि ' वे क्यों रात को देर तक बाहर ना रहें?पुरुष बाहर देर तक रहना छोड़ दें', वे क्यों शालीन  कपडे पहनें? पुरुष अपनी आँखें बंद कर ले' ,' जो महिलायें साडी और सूट पहनती  हैं उनका  भी या छोटी- छोटी बच्चियों का बलात्कार क्यों होता 'है? यह सब नारे लगाकर या दलीलें देकर  हम केवल अपने आप को धोखा दे रहे हैं और सच्चाई से भाग रहे हैं। इनमें से अधिकतर घटनाएं हमारी लापरवाही के कारण होती  है। अपनी छोटी  बच्चियों को सुरक्षित स्थानों पर ही छोड़े, उन पर कड़ी नज़र रखें और आमिरखान के शो में जो शिक्षा उसने बच्चियों को दी थीं वह आप भी अपनी बच्चियों को दें,जिससे समस्या पूरी तरह   समाप्त नहीं होंगी तो बहुत कम अवश्य  हो जायेंगी।  यहाँ पर यह कहावत भी  चरितार्थ होती है कि 'आटे  के साथ घुन भी   भी पिस जाता है '। इन दलीलों और नारेबाज़ी से   क्या बलात्कार की संख्या में कमी आई है? नहीं ना !   समाज और पुलिस के विकृत रूप से हम  सभी   भली - भांति परिचित हैं और हम यह भी जानते हैं कि उनको   सुधारना भी तब तक  असंभव है, जब तक वह स्वयम न चाहे तो क्यों नहीं हम अपने ही  रहन - सहन और व्यवहार में  सुधार  ले आयें और बचाव का रास्ता अपना लें? महिलाओं की यह भी दलील है कि पहले ज़माने में भी सीमा में रहने के बावजूद बलात्कार होते थे,लेकिन मीडिया वर्तमानकाल के जैसे सशक्त न होने के कारण प्रकाश में नहीं आती थीं । यह भी केवल भ्रम है, उस समय अधिकतर ऐसी घटनाएं  अशिक्षित परिवारों के अन्दर ही हुआ करती थीं । इस तरह खुलेआम सड़कों पर नहीं होती थीं । कभी एक- आध घटना होती थी तो वह सारे देश के सामने ऐतिहासिक घटना का रूप लेकर आती थी। और उसको पुलिस पकड़ कर ही दम लेती थी। मुझे इसी तरह की दिल्ली की  एक चोपड़ा बच्चों  की घटना  और उनके कथित अपराधी रंगा, बिल्ला की याद आज भी है। उस घटना के बारे में पता लगने पर सारा देश सकते में आ गया था

Monday, March 12, 2012

उदास आंखो की चमक

सुमन प्रतिदिन की तरह आज भी बस स्टॉप पर उन घूरती निगाहो को तलाश रही थी. यह उसका प्रतिदिन का काम था और वह भी तो उसको एकटक देखता ही रहता था. वह समझ नहीं पाती आखिर वह उसको क्योँ देखता रहता है. कभी-कभी तो उसका इस तरह देखना उसके लिए असह्य हो जाता था. फिर वह मन ही मन अपना जायजा लेने लगती, सोचती उसमें कुछ भी तो विशेष ऐसा नहीं है, जो किसी को आकर्षित कर सके. पिता की मृत्यु के बाद वह ही अपनी बीमार मां और एक बहन का खर्चा नौकरी करके चला रही थी, इसलिए अपने रख -रखाव पर खर्च करने के लिए उसकी छोटी सी नौकरी में कुछ बचता ही नहीं था. परिवार की ज़िम्मेदारी के बोझ तले दबे होने के कारण, उसकी अपनी इच्छाएँ तो अर्थहीन हो गई थीं. इसलिए चेहरा तो साधारण था ही, युवावस्था की स्वाभाविक सुन्दरता भी लुप्त हो गई थी. उसका चेहरा बुझा-बुझा रहता था. आंखो में रेगिस्तान की तरह सूनापन पसरा रहता था. कुछ भी तो उसमें ऐसा नहीं था कि किसी की निगाहें उस पर टिक जाएं. फिर क्योँ वह उसको देखता रहता है. उसकी घूरती निगाहें उसके मन में एक हलचल सी पैदा कर देतीं.लेकिन जब वह अपनी परिस्थितियो के बारे में सोचती तो उदास हो जाती.


उन घूरती निगाहो का मालिक देखने में सौम्य तथा शिष्ट था. वेश-भूषा से साधारण घर का लगता था. विपरीत परिस्थितियो के होने के बावजूद जब से सुमन उन घूरती निगाहो से परिचित हुई है उसके अंदर एक अजीब सा परिवर्तन आ गया था. अब वह पहले की तरह लापरवाही से तैयार नहीं होती. बस स्टॉप पर जाते हुए उन आंखो को देखने की उत्सुकता के कारण जल्दी- जल्दी कदम बढाती हुई इसी उधेडबुन में खोई-खोई कब घर से बस स्टॉप का लम्बा रास्ता तय कर लेती थी पता ही नहीं चलता था.
आज सुमन को ऑफिस जाने में देर हो गई थी. मां की तबियत खराब होने के कारण घर का सारा काम करके वह जल्दी - जल्दी घर से बस स्टॉप की ओर चली. उसने दूर से देखा बस स्टॉप पर बस का इंतज़ार करने वाले यात्रियो की पंक्ति बहुत लम्बी थी. पंक्ति के आरम्भ से अंत तक उसने आँखे दौडाई. उसकी निगाहें अंत में जा कर टिक गईं. वह भी जैसे उसकी प्रतीक्षा कर रहा था. वह उसके पीछे जाकर खड़ी हो गई.बस में दोनो एक ही सीट पर बैठे. कुछ देर दोनो मौन बैठे रहे. फिर अचानक उस सहयात्री ने सुमन से पूछा, "आप दरियागंज में कहाँ रहती हैं? वह जैसे इस प्रश्न की प्रतीक्षा ही कर रही थी, सकुचाते हुए बोली, "जी, मैं गोलचा के पास ही रहती हूँ." "अच्छा!" कुछ चौकता हुआ वह बोला, " मैं अक्सर वहां जाता रहता हूँ, आप कभी दिखाई नहीं दीं ?" 'इससे पहले कि सुमन कुछ बोले, वह ही अपने बेतुके प्रश्न पर झेपता हुआसा बोला, "मेरा मतलब, वहां मेरा एक मित्र रहता है, ‘रवि’. आप उसे जानती हैं?" सुमन के कुछ बोलने से पहले अपने इस दूसरे बेसिर पैर के प्रश्न का उत्तर भी स्वयं ही दिया, "दिल्ली में जीवन इतना व्यस्त है कि लोग अपने पड़ोसियो के बारे में भी ठीक तरह से नहीं जानते, फिर रवि को आप कैसे जान सकती हैं?"

" सुमन सोच रही थी कि वह क्या बेसिर पैर की बातें कर रहा है. लेकिन फिर भी उसकी बातें उसको अच्छी लग रही थीं. सुमन समझ रही थी कि सुनील क्या पूछना चाह रहा है, इसलिए वह इधर-उधर की बातोँ में समय बर्बाद ना करके बोली , "जी मैं एफ़.ग्यारह में रहती हूँ."
"मैं 'ए'ब्लॉक में रहता हूँ, मेरा नाम सुनील वर्मा है....."
" कनाट सर्कस उतरने वाले आगे आ जाएँ......?" कंडक्टर की आवाज़ आई.
"अच्छा, मैं चलूँ, फिर मिलते हैं. नमस्कार !" सुनील ने कहा और बस से उतर गया.
सुमन रास्ते भर रवि के बारे में ही सोचती रही. उसके नीरस जीवन में उसकी बेतुकी बाते भी मानो रस घोल रही थीं. कितना अधूरा था उसका जीवन, हर रोज़ इसी तरह ऑफिस जाना, वहां फाइलो में सिर खपाना. फिर घर आके बीमार मां के दुखड़े सुनना. अपनी बहन, सीमा की फरमाइशें पूरी करना. अन्य लड्कियो की मां की तरह उसकी मां उसके विवाह की चिंता तो करती थी, लेकिन सुमन के बिना रहने की कल्पना मात्र से वह घबरा उठती थी. आजकल तो उन्होने उसके विवाह की चर्चा करना भी छोड़ दिया था.

उसने भी जैसे अपनी मां-बहन के लिए अपने आप को मिटाने के लिए सोच लिया था. पर यह कुछ दिनोँ से उसे क्या होता जा रहा है. सुनील से मिलने के बाद उसे लगा कि वह स्वार्थी बन जाए. सबको छोड़ कर अन्य लड्कियो की तरह वह भी अपना घर बसा ले और सुख चैन से जीए. लेकिन तभी उसके सामने असहाय तथा बीमार मां की अपराध-बोझ से झुकी हुई निरीह आँखें आ जातीं. तभी कंडक्टर की आवाज़ से उसके विचार तंतुओं को झटका लगा. ऑफिस पहुँच कर भी वह सोच में ही डूबी रही. वह सोच रही थी, कहीं सुनील को लेकर उसकी आशंका निराधार तो नहीं, हो सकता है उसके मन में कुछ भी ना हो. लेकिन झटके से दूसरा विचार उसके स्थान पर आता कि कोई किसी में इतनी दिलचस्पी ऐसे ही नहीं लेता. कुछ दिन ऐसे ही चलता रहा. सुनील प्रतिदिन उसको बड़ी शिष्टता से ''हलो" कहता और यह एक साधारण सा शब्द उसके जीवन में उथल - पुथल मचा देता.

एक दिन रविवार को घर के काम-काज में व्यस्त थी कि अचानक उसकी छोटी बहन आकर बोली, " दीदी, आप से कोई मिलने आया है." वह सोच में पड़ गई कि ऐसा कौन आया है, जिसे उसकी बहन नहीं जानती. सुनील था वह. उसे देख कर वह हैरान सी हुई. उसके अचानक आने से उसे परेशानी भी हुई, जो सुनील की आंखो ने भांप लिया था. इससे पहले कि सुमन कुछ बोले, उसने कहा, "मेरा ऐसे बिना सूचना दिए आना बुरा तो नहीं लगा? यहाँ अपने दोस्त के घर मिलने आया था, सोचा आपसे मिलता चलूँ." "नहीं, आइये-आइये" फिर कमरे में बिखरा सामान समेटते हुए कुछ झेपती सी कुर्सी पर से कपडे हटा कर बोली, "बहुत अच्छा किया, आप बैठिये. मैं अभी आई. छोटी बहन अभी भी पास में खडी सुनील को ऐसे देख रही थी, जैसे वह कोई अजूबा हो. सुमन ने आँख दिखाई तो वह सहम कर बाहर चली गई.
अकेला होने के कारण सुनील कमरे का अवलोकन करने लगा. बहुत पुरानी बेंत की चार कुर्सियां, बीच में बेंत की ही एक टेबल रखी थी . कोने में एक टेबल पर छोटा टी. वी. दीवार पर एक अधेड उम्र के व्यक्ति की फोटो, जिस को माला पहनाई हुई थी. उसको देखकर सुनील को जो आशंका हुई वह बाद में सुमन से बात करने के बाद सत्य में परिवर्तित हो गई थी. परदे भी धुल-धुल कर रंगहीन हो गए थे. कुल मिला कर हर वस्तु अपने मालिक की गरीबी की दास्ताँ कह रहे थे. सुमन ने अन्दर जाकर अपनी मां से कहा, "मेरे ऑफिस का सहकर्मी आया है, ज़रा चाय बना देना और उसके साथ समोसे मंगवा कर रख देना और हाँ जब चाय बन जाए मुझे आवाज़ दे देना, सीमा को मत भेजना. "अपनी छोटी बहन की सुन्दरता से वह अपने को असुरक्षित अनुभव कर रही थी.
सुमन लौट कर जब वह कमरे में आई तो उसने देखा सुनील अखबार पलट रहा था. उसने सुमन से परिचय बढाने हेतु पूछा, "यदि आप बुरा ना माने तो मैं एक बात पूछ सकता हूँ ? आपके परिवार में कौन-कौन हैं? सुमन को लगा जैसे उसके इस प्रश्न ने उसके घाव कुरेद दिए. अपने आप को सँभालते हुए बोली, "पिताजी की मृत्यु सात साल पहले हो गई थी, तब मैंने बी. ए. पास किया ही था, एक छोटी बहन है जो मुझसे पांच साल छोटी है और बी.ए. अंतिम वर्ष में है, मां है, जो अक्सर बीमार ही रहतीं हैं.” "और कोई भाई नहीं है?" सुनील ने पूछा." “नहीं." सुमन ने संक्षिप्त उत्तर देते हुए गहरी सांस ली. सुनील ने सहनुभुति दिखते हुए अपनेपन से पूछा कहा, आपके पिताजी क्या करते थे?" "वे एक प्राइवेट फर्म में नौकरी करते थे, उनके देहांत के बाद उनके स्थान पर ही मुझे नौकरी मिली है." "इसका अर्थ है, मां-बहन की पूरी ज़िम्मेदारी आप पर है ?" सुनील के इस सवाल से उसका गला भर आया लेकिन वह संयत होकर बोली, "छोड़िए , क्या करेंगे जान कर, कोई दूसरी बात कीजिये, अपने बारे में कुछ बताइये." उत्तर में सुनील बोला," मेरे मां- बाप का देहांत मेरे जन्म के चार साल बाद ही एक दुर्घटना में हो गया, मेरे मामा- मामी ने मुझे अनाथ की तरह पाला, जबकि मेरे मां-बाप ने मेरे पालन-पोषण के लिए पर्याप्त धन छोड़ा था. वे लखनऊ में रहते हैं. मैंने एम्.बी.ए. किया है. पिछले पांच सालोँ से एक आई.टी. कंपनी में कार्यरत हूँ. "सुमन बड़े ध्यान से उसकी बात सुन रही थी. इससे पहले किसी ने उसके जीवन में झाँकने की कोशिश नहीं की थी, इसलिए उसकी उदास आँखें एक क्षण को चमक उठीं. अचानक सुनील की नज़र अपनी घड़ी की ओर गई, और उठते हुए बोला,
"आपका बहुत समय ले लिया. अब चलता हूँ, अगर बुरा ना माने तो अपना मोबाईल नं. दे दीजिये." थोडा संकोच से सुमन बोली, "एक मोबाईल है, जो मां के पास रहता है. मैं तो ऑफिस के फोन से काम चला लेती हूँ. "इस जवाब को सुनकर सुनील कुछ झेपते हुए बोला, अच्छा तो मैं चलता हूँ, फिर मिलते हैं."

बस स्टॉप पर तो उनका मिलना होता ही था. अब वह पंद्रह- बीस दिनोँ में उसके घर भी आ जाता था. उसकी मां से भी बहुत आत्मीयता से बात करता था. मां भी उससे उसके हाल-चाल पूछती रहती थी. मां का सहयोग होने के कारण सुनील के आने से सुमन को कोई असुविधा का एहसास नहीं होता था. धीरे-धीरे उसका संदेह कि सुनील उसके साथ विवाह करना चाहता है विश्वास में बदलने लगा था, लेकिन जीवन की सच्चाइयो के बारे में सोचते ही वह असमंजस की स्थिति में हो जाती कि वह क्या करे, क्या ना करे.

एक दिन हमेशा की तरह सुमन सुनील से घर पर बात कर रही थी कि अचानक उसकी छोटी बहन ने उसकी साड़ी, जो कि उसने कुछ खास मौको पर पहनने के लिए खरीद कर रखी थी, पहन कर कमरे में प्रवेश किया और मुस्कुराती हुई बोली, " दीदी, मैं अपनी सहेली की शादी में जा रही हूँ." उसको अपनी साड़ी में देखते ही सुमन का चेहरा तमतमा उठा. उसने उससे साड़ी पहनने की अनुमति लेना भी अनिवार्य नहीं समझा. उसको अपना अस्तित्व अपने घर में मात्र उन लोगोँ की आवश्यकताओं को पूरा करना लगा. उसकी भावनाओं का उनके लिए कोई महत्व नहीं था. ये विचार उसके मन में विद्युत् गति से आये और निकल गए. पर उससे अधिक वह शायद उसका रूप नहीं सहन कर पा रही थी. कितना अंतर है दोनोँ में सत्ताईस साल की सुमन जहां गंभीर और ज़िम्मेदार थी, वहीं बीस साल की सीमा लापरवाह और खिलंदड़ी थी. उसकी उम्र में ही उसने कितनी जिम्मेदारी ओढ़ ली थी. एक सीमा है बिलकुल मस्त.
सीमा जा चुकी थी.

अगले दिन शाम को जब वह ऑफिस से लौटी, तो आते ही उसकी मां ने उसके सर पर हाथ फेरते हुए बोली, " क्योँ बेटा बहुत थक गई है? "सुमन जानती है, उसकी मां को उस पर इतना दुलार तभी आता है जब उसे उससे कोई काम कहना होता है, या कोई बात मनवानी होती थी. इसलिए अनमने मन से उसने कहा, "नहीं, कहिये क्या काम है?" " बेटा, एक बात पूछूं ? यह सुनील कैसा लड़का है?" सुमन इस अप्रत्याशित प्रश्न को सुनकर चौँक गई. उसका मन एक बार को ग्लानि से भर गया. कितनी गलत धारणा थी उसके मन में उसकी मां को लेकर. प्रत्यक्ष में वह उसके विवाह को लेकर चिंता नहीं दिखाती थी, लेकिन अंदर से तो चिंतित रहती होगी. "क्योँ? बहुत अच्छा है." उसने कुछ सकुचाते हुए कहा. " तो फिर अपनी सीमा के लिए उससे बात करके तो देख." मां ने कहा.

सुमन जैसे आसमान से धरती पर गिर पडी.बात उसकी सोच के बिलकुल विपरीत निकली. उसकी आंखो की क्षणिक चमक लुप्त हो गई थी. पलक झपकते ही वह समझ गई, तभी उसकी मां, सुनील के घर आने पर इतनी प्रसन्न होती थी और बड़े मन से उसको उसकी पसंद का खाना बना कर खिलाती थी. कल मां ने ही सीमा को सुनील के सामने साड़ी पहना कर भेजा होगा. वह इसे मां का षड्यंत्र कहे या बेबसी. उसको कुछ समझ नहीं आ रहा था. ये विचार उसके मन में चलचित्र के समान आ-जा रहे थे. उसको लगा वह चिल्ला कर पूछे, “सीमा क्योँ? वह क्योँ नहीं?" तुरंत उत्तर ना मिलते देख मां ने फिर पूछा, "क्या सोचने लगी बेटा? क्योँ तुझे बात पसंद नहीं आई?" '' बात करके देखूंगी मां." सुमन ने तटस्थ भाव से उत्तर दिया.

सुमन हमेशा की तरह कपडे बदलने के बहाने अपने कमरे में गई और अन्दर से दरवाज़ा बंद करके भगवान् की फोटो के सामने फूट-फूट कर रोते हुए बुदबुदाने लगी, "हे भगवान! मुझे यह क्या होता जा रहा है? यह कैसी परीक्षा की घड़ी है? जिस सीमा को मैं इतना प्यार करती थी, अचानक उससे मुझे ईर्ष्या क्योँ होने लगी? मैं इतनी स्वार्थी क्योँ होती जा रही हूँ ? लेकिन मैं भी क्या करूं, मेरी किसे चिंता है? एक ही घर में पैदा हुईं हम दोनो बहनोँ के भाग्य में इतना अंतर क्योँ? आखिर क्योँ......? जैसे वह इन सब सवालोँ का उत्तर भगवान् से मांग रही थी.
थोड़ी देर में अचानक उसने अपने आंसू पौन्छे और मन ही मन कोई निर्णय लिया, जैसे भगवान ने ही उसको कुछ सुझाया हो. अगले दिन वह सुनील का बस स्टॉप पर इंतज़ार कर रही थी....

इन्टरनेट

छब्बीस साल पहले ही इस कहानी की नींव पड़ गई थी.शोभा का विवाहधूम-धामसे हो गया.उस ज़मानेमें न तो कोई लडकी से उसकी पसंद ही पूछता था.न ही उसे बताने का अधिकार ही दियाजाता था.अधिकार नमिलने का अर्थ यह नहीं है कि उसकी कोई इच्छा नहीं होतीथी. लेकिननियति समझ कर उन्हें परिस्थितियो से समझौता करना पड़ता था.परन्तु उसज़माने में भी शोभा अन्य लड़कियो से भिन्न थी.



विभोर को देखकर शोभा को ऐसा कुछभी एहसास नहीं हुआ कि उसको वहजीवन साथी बना ले.परिवार वालो को वह कुछ अनमनी सी दिखाई भीदी, लेकिनकिसी ने इस बात की परवाह नहींकी.मां-बापको लग रहा था कि लड़का खानदानीहै,पढ़ा-लिखाहै, अच्छीनौकरी है और चाहिए ही क्यासुखी वैवाहिक जीवन के लिए?शोभा के पासभी कोई ठोस तर्क नहीं था मनाकरने का.इसलिए उसनेभी प्रत्यक्ष रूप से विरोधनहीं किया.




शोभाबहुत साहसी लडकी थी .वह 'जीयोऔर जीने दो 'मेंविश्वास रखती थी.त्याग कीभावना उसके अन्दर कूट-कूटकर भरी थी.किसी को खुशीदेकर उसे बहुत आत्मसंतुष्टिमिलती थी.उसको लगताथा जीवन जीने के लिए है,बोझ की तरहढ़ोने के लिए नहीं है.विवाह केबाद ससुराल में सबने शोभा का स्वागत किया.लेकिन उसनेपाया कि न तो विभोर के मन मेंही उसके लिए, न ही उसकेमन में विभोर के लिए कोई विशेषखिंचाव है.शोभा को अपनेमन की स्थिति के बारे में तोपता था,लेकिन विभोरके साथ ऐसा क्यो है? वह समझ नहींपा रही थी.उसने सोचाकि उसका स्वभाव ही ऐसा होगा.परन्तु विभोरउसकी हर ज़रुरत का ध्यान बहुतरखता था.विदा के समयमां ने धीरे से विभोर से कहाथा, ''शोभाकी पढाई-लिखाईबेकार न जाये,इस बात काध्यान रखना.''विभोर इसबात को विवाह के बाद भूला नहीं.उसने शोभाको कुछ भी करने की पूरी स्वतंत्रतादे रखी थी.लेकिन वहअपने भविष्य के बारे में सोचे, इससे पहलेही साल भर के अन्दर ही एक प्यारीसी बेटी की मां बन गई.लेकिन विभोरके स्वभाव में कोई परिवर्तननहीं आया.



एकदिन शाम को शोभा अपनी सासको चाय देने के लिए जैसे ही कमरे में घुस रही थी कि विभोरके नाम का जिक्र सुनकर वह दरवाजेपर ही ठिठक कर वह खडीहो गई.उसने सुनाकि उसकी ननद उसकी सास से कहरही थी,''विभोर भैय्याके एक बेटी भी हो गई,लेकिन अभीभी लगता है वे सुमन को भूलेनहीं हैं, आपने उनकाविवाह सुमन से न करवाके सहीनहीं किया." सास को बेटीकी टिप्पणी अच्छी नहीं लगी.उन्होने लापरवाही से जवाब दिया,''समय सब ठीक कर देगा.''यह वार्तालापसुनकरशोभा को जैसे काठ मार गया.कहते हैंठुकराया हुआ प्यार बुझता नहींहै, धुआंछोड़ता रहता है,और यह धुआंशोभा तक भी पहुँच गया था.कुछ पलो केलिए वह भूल गई थी कि उसके हाथमें चाय की ट्रे है.जब उसे होशआया तो वह बनावटी मुस्कान केसाथ कमरे में दाखिल हुई.चाय देकर वहअपने कमरे में आई और फूट-फूटकर रोने लगी.



सारीस्थिति उसके सामने साफ हो गईथी कि विभोर क्यो उससे इतनीदूर-दूररहता है.उसे लगा किउसके साथ धोखा हुआ है.लेकिन इसमेंविभोर की क्या गलती थी,वह ज़माना हीऐसा था जब बच्चो को मां-बापकी इच्छा के आगे नत मस्तक होनाही पडता था.उसने सोचाकि इधर-उधरबात करने से अच्छा है कि वहसीधे विभोर से ही बात करे.उसने मन हीमन कुछ तय किया और विभोर केऑफिस से आने का इंतजार करनेलगी.



शामको जब विभोर ऑफिस से आया तोचाय पीने के बाद बिना कोई भूमिकाबांधे शोभा नेउससेपूछा,'' यह सुमनकौन है ?''विभोर इसप्रश्न के लिए बिलकुल तैयारनहीं था. वह कुछ सोचमें पड गया,और बोला,''क्या करनाहै जानकर?तुम्हेंउसके बारे में किसने बताया?''शोभा ने सारीघटना उसे साफ- साफ बता दी.तब शोभा केबहुत आग्रह करने पर विभोरने बताया कि वह उसके ऑफिस मेंकाम करती थी.वह उससे विवाहकरना चाहता था लेकिन अंतरजातीयहोने के कारण उसके मां-बापने उसे बहु स्वीकार नहीं किया.अब उसने दूसरेशहर में अपना ट्रान्सफर करवालिया है औरउसकाउससे कोई संपर्क नहीं है,लेकिन एक हीऑफिस में होने के कारण उसकाहाल-चालपता चलता रहताहै. ''उसकाविवाह हो गया?'' शोभा नेपूछा.''नहीं हुआ, लेकिन यह सबपूछने से क्या लाभ है ? वह मेरा बीताकल था.''विभोर नेअनमनेपन से उत्तर दिया.'' लाभ है, मैं उससे मिलना चाहती हूँ .मैं यह अधूरीज़िन्दगी नहीं जीना चाहती.मैं तुम्हेंअपने बंधन से मुक्त करती हूँ''शोभा ने अपनीबात पर जोर देते हुए कहा.विभोर यहअप्रत्याशित निर्णय सुनकरहैरान रह गया.''मेरा निर्णयअंतिम है,तुम जब चाहोअपनी बेटी से मिलने आ सकते हो,ज़बरदस्तीएक छत के नीचे एक साथ रहना मुझेस्वीकार नहीं है.'' इतनासुनने के बाद विभोर के चेहरेपर आये खुशी के भाव उससे छुपेनहीं रहे .इस कथन के पीछे शोभा की वास्तविकभावना को वह नहीं जानता था.प्रत्यक्षरूप में जो दिखाई दे रही थीउसी को उसने सत्य माना लिया.



उसकेइस फैसले से मायके वाले खुशनहीं थे.ससुराल वालो के खुश होने का तो कोई सवाल हीनहीं था.शोभा ने फैसलाकिया कि वह किसी पर बोझ नहींबनेगी .उच्च शिक्षाप्राप्त होने के कारण उसे एकआवासीय कॉलेज में लेक्चरारकी नौकरी मिल गई.आरम्भ मेंकई साल तक विभोर अपनी बेटी से मिलने आता रहा.फिर वह कंपनीकी तरफ से विदेश चला गया.उसके बादउसका मां-बेटी से संपर्क ही टूट गया .



कई शुभचिंतको ने शोभा को पुनर्विवाह की सलाहदी. लेकिनवह मन से इसके लिए कभी तैयारनहीं हो पाई.धीरे-धीरेसमय बीतने लगा.शोभा की बेटी ,सौम्या बड़ीहोने लगी.एम.बी.ए.की पढाई पूरीहोने के बाद उसकी अच्छी कम्पनीमें नौकरी भी लग गई.एक दिन सौम्या ने शोभा को बताया कि उसका एकसहकर्मी उससे विवाह करना चाहताहै. शोभाको अपनी बेटी की समझदारी पर पूरा भरोसा था.देखते हीउसको लड़का पसंद आ गया और उसनेविवाह की स्वीकृति दे दी .



विवाहके कुछ महीनो बाद ही पता लगाकि सौम्या के पति को कम्पनीकुछ सालो के लिए अमेरिका भेजरही है.सौम्या बहुतसोच में पड़ गयी कि वह कैसे अपनीमाँ को अकेला छोड़ कर जाए.लेकिन शोभाने उसे बहुत समझाया कि अब तोमोबाइल और इन्टरनेट के कारणदुनिया बहुत छोटी हो गयीहै और विवाह के बाद हर अच्छीलडकी की तरह उसे भी हर हालमें पति का साथ निभाना चाहिए.



जाने से पहले सौम्या ने अपनीमाँ को कम्प्यूटर ऑपरेट करना सिखा दिया.आज के ज़मानेमें कनेक्टिविटी बनाये रखनेके लिए इन्टरनेट सेअच्छा कोई साधन नहीं है.जब चाहे बेटीको वेबकेम पर देख लेती थी,चैटिंग करतेहुए उसको समय का पता ही नहींचलता था.बेटी से दूरीका एहसास बहुत कम हो गया था.उसेसोशल नेटवर्किंगएक चमत्कार से कम नहीं लगा.वह अपने बचपनकी सहेलियो को इसके द्वाराकनेक्ट कर सकती है,जो समय के बहावके साथ जाने कहाँ खो गईं हैं.यह शोभा ने सीखने के बाद ही जाना.




अचानकएक दिन फेसबुक पर एक फ्रेंड रिक्वेस्टदेख कर वह बुरी तरह चौक गई.''अरे!यह तो विनयहै,'' वह मन ही मन बुदबुदाई.उसको अपनीआँखो पर विश्वास ही नहीं होरहा था.उसने उसकाप्रोफाइल खोल कर डिटेल देखा तो उसका संदेह सच निकला.विनय प्रोफाइलफोटो से बिलकुल पहचान में नहींआ रहा था.उम्र ने उसकीतरह विनय पर भी गहरी छाप छोडीथी. पुरानी यादें ताज़ा हो गई.वह अपने तीससाल पहले अतीत में खो गई.वे दोनोंएक ही कॉलेज में पढ़ते थे.एम.ए.की दो सालकी पढाई एक साथ करते हुए, दोनों कबएक दूसरे के करीब आ गए पता हीनहीं चला.इससे पहलेकि दोनों अपने मन की बातकहते,परीक्षासमाप्त होते ही विनय अपने शहरलखनऊ लौट गया.मन की बातमन में ही रह गई.उसकी यादशोभा के मन में एक मीठी कसकबनकर रह गई थी.वह जबकभी किसी का नाम विनय सुनतीतो उसक यादताज़ा हो जाती.धीरे-धीरेयादें भी धूमिल होती चलीगईं.लेकिन आजउसको फिर से सब कुछ याद हो आयाथा. शोभासोच में पड़ गई कि वह फ्रेंडरिक्वेस्ट को एक्सेप्ट करे या नहीं.उसका भी विवाहहो गया होगा,बच्चे होंगे.कहीं उसकापरिवार उसके कारण डिस्टर्बन हो.इसी उहा-पोहमें एक सप्ताह निकल गया.एक दिन उसकाफिर से मेसेज में रिक्वेस्ट आया.उसके दिलमें फिर से उथल-पुथलमच गई उसने अपने मन को समझायाकि ज़माना बदल गया है.अब पहले वाली किसी की सोच नहीं रह गई है. एक बार बातकरके देखे तो,वह क्या चाहताहै. यह सोच करउसने एक्सेप्ट टैब को उंगली से दबा दिया.

फ्रेंडलिस्ट में ऐडहोतेही वह ऑन लाइन दिखाई दिया.एकदम उसीसमय चैट मैसेजआया,''हेलो,कैसी हो ?''जैसे वह उसकेफ्रेंड लिस्ट में ऐडहोनेका इंतज़ार ही कर रहा था.शोभा को बड़ाअजीब सा लग रहा था, इतने सालबाद उससे बात करते हुए.उसके दिल कीधड़कनें बढ़ गईं.लेकिन जवाबतो देना ही था.उसने लिखा,''ठीक हूँ'' विनयने उसके परिवार के बारे मेंजानना चाहा तो उसने सारीस्थिति सच-सचबता दी.अब शोभा कीबारी थी उसके बारे में जाननेकी. उसनेपूछा,''तुम्हारी पत्नी कैसी है? कितने बच्चेहैं?''विनय नेकहा,''शादी हीनहीं की.'' '' क्यो?''शोभा ने चौककर पूछा,''तुम्हारीजैसी कोई मिली ही नहीं”,“शोभा केवैवाहिक जीवन के बारे में पतालगने के बाद विनय की हिम्मतबढ़ गई थी.जो अब तक वहनहीं कह पाया था,वह उसने कहदिया.शोभा कोयह एक सपने जैसा लग रहा था,सबकुछ अप्रत्याशित. इसेकुदरत का करिश्मा कहें यासाइंस की देन कहें.शोभा के सामनेउसके अपने भविष्य की तस्वीरसाफ होने लगी थी.जो शोभा नेसोचा वही सच निकला.विनय ने बतायाकि वह उसको कभी भुला नहीं पाया और वह शेष जीवन उसके साथबिताना चाहता है.अजीब सीहलचल उसके मन में होने लगी.विनय से मिलनके मीठे एहसास मात्र से ही उसका मन पुलकित हो उठा. उसकोलगा कि उसके पति के लिए त्याग काही प्रतिफल उसे मिलाहै. उसनेइसे अपने भाग्य का चमत्कारसमझकर स्वीकार कर लिया.वह सोचनेलगी कि काश यह इन्टरनेट उसकेज़माने में भी होता तो इतने दिनके अकेलेपन की त्रासदी उसेनहीं झेलनी पड़ती लेकिन कहागया है न कि 'जब-जबजो-जोहोना है.तब-तब सो-सोहोता है'. अपनी बेटीकी इस ज़माने की सोच को तो वहजानती ही थी.अपनी मां कीखुशी के लिए वह कुछ भी करसकती थी.

-सुधा कसेरा ,

वह एक रात!!!!!


 हैदराबाद   में रहते हुए कई  वर्ष हो गए  थे,लेकिन अभी तक शिव जी के
प्रसिद्द मंदिर श्रीसेलम जाने का सौभाग्य प्राप्त नहीं हुआ था.यहां के
निवासिओं से श्रीसेलम मंदिर के बारे में ज्ञात हुआ, कि यह शिवजी का मंदिर
प्रसिद्द बारह शिवलिंगो में से एक है.हैदराबाद से यह लगभग २२0 किलोमीटर
दूर है और यह चारोँ ओर से मनोरम पर्वतो और घाटिओं से घिरा हुआ है.वहां की
प्राकृतिक शोभा देखते  ही बनती है और यह भी पता चला कि वहां जाने के लिए
सबसे अच्छा साधन  अपनी गाड़ी या टैक्सी है.  अपने पति, बेटे रोहित और बहू
अनु, जिनका विवाह एक वर्ष पहले ही हुआ था, के विवाह के वर्षगाँठ पर
श्रीसेलम मंदिर  जाने की योजना बनाई.
                      घर से सुबह पांच बजे यात्रा के लिए रवाना हो गए.
रास्ते में रुकते- रुकाते  लगभग छः घंटे में मंदिर के गेट पर
पहुंचे.लेकिन गेट के बाद  भी   दो- तीन किलोमीटर फैले हुए   एक घने जंगल
से  गुज़रना पड़ा. अँधेरा होते ही जंगल से गुज़रने वालो को रोकने के लिए
बैरियर लग जाते हैं.  क्योँकि  उस जंगल में जंगली जानवर खुले घूमते हैं.
उसके बाद चार-पांच किलोमीटर घाट का रास्ता है. पहले जंगल में जंगली
जानवरो को एक झलक देखने के लिए आँखें इधर से उधर फिसल रही थीं.  उसके बाद
घाट से गुज़रते समय प्रकृति की शोभा देखते समय मानो आँखे उन पर बर्फ की
तरह जम रही थीं.जुलाई का  महीना होने के कारण बारिश की हल्की फुहार पड़
रही थी.कहने की आवश्यकता नहीं है कि बारिश के पानी में नहाई हुई घाटियाँ
बहुत मनमोहक लग रही थीं. घाटियाँ पार करते ही हमारी गाड़ी एक  होटल के
सामने रुकी.इस होटल के बारे में रोहित को उसके एक मित्र ने बताया था कि
उस होटल से प्रकृति की सुन्दरता देखते ही बनती है.उसमें हमने चलने से
पहले ही बुकिंग करवा ली थी.  होटल में पहुँचने के बाद पता चला कि उसमें
पहली मंजिल पर दो ही कमरे यात्रिओं  के ठहरने  के लिए बने हैं.नीचे होटल
के रख रखाव के लिए कर्मचारी रहते थे.

कमरे  में सामान रखने के बाद कमरो के पीछे एक बड़ी सी बालकनी बनी थी,
उसमें हम चारो चले गए.बालकनी की रेलिंग पकड़ कर खड़े हो गए.वहाँ से
प्रकृति का सौन्दर्य
                                देखकर मन पुलकित हो गया.बालकनी के नीचे
एक खाई थी, जिसमें एक नदी बह रही थी.बड़े- बड़े वृक्ष थे, ठंडी बयार
बारिश के पानी की फुहार  को ठेलते हुए बालकनी को भिगो रही थी और अब वे ही
 बूंदें  हमारे शरीर से अठखेलियाँ कर रही थीं.दृश्य इतना मनमोहक था कि
हमारे  रास्ते की थकान छूमंतर हो गई.वहाँ से हटने का मन ही नहीं हो रहा
था.लेकिन जिस काम के लिए आये थे वह भी ज़रूरी था.हम लोग तैयार होकर मंदिर
गए, जो होटल के पास ही था.लौटते हुए शाम हो गई.रास्ते में हमने एक
रेस्तरां में चाय पी.उसके बाद  होटल में पहुँच कर हम बालकनी में
कुर्सियां बिछा कर बैठ गए.सब कुछ सपने जैसा लग रहा था.थोड़ी  ही देर में
अँधेरा छा गया और वातावरण की सारी ख़ूबसूरती अन्धकार में छिप गई.बस दूर
जलते हुए बल्बो की पंक्ति टिमटिमा रही थी.अब अँधेरे में बाहर बैठना बेकार
था. इसलिए हम सभी कमरे में आ गए. कमरा और बाथरूम देखकर लग रहा था  कि
होटल बहुत पुराना होगा.लेकिन फिर भी वहाँ के प्राकृतिक दृश्य के आगे सब
कुछ महत्वहीन था.दो रातें हमें वहाँ गुजारनी थीं. खाने का बहुत सारा
सामान साथ लेकर आए थे.सबने मिलकर खाना खाया.रात के ९ बज चुके  थे. अँधेरे
में कहीं जाने का कोई मतलब नहीं था यात्रा का भरपूर आनंद लेने के लिए हम
सबने ताश  खेलने की सोची.अभी खेलना आरम्भ किया ही था  कि अचानक जोर की
आंधी चलने लागीऔर बारिश पड़ने लगी, जिसने थोड़ी ही  देर में  भयंकर
तूफ़ान का रूप ले लिया था .बारिश का पानी कमरे के दरवाज़े को पार करने
लगी तो हमने दरवाज़ा बंद कर लिया.पूरी बालकनी वृक्षो के सूखे  पत्तो से
भर गई थी.वे कमरे के दरवाज़े से भी टकरा रहे थे.ताश खेलते- खेलते कब रात
के ग्यारह बज गए पता ही नहीं चला.अचानक खेल को रोकते हुए अनु बोली ''मैं
ज़रा बाथरूम होकर आती हूँ.''पांच मिनट में ही वह गीला चेहरा पौछते हुए
लौटी.अभी किसी को नींद नहीं आ रही रही थी, इसलिए गेम जारी रहा.रात के
बारह बजे हमने सोने का विचार किया,जिससे अपनी नींद पूरी करके प्रातः
उठकर यात्रा का पूरा आनंद उठा सकें.रोहित और अनु दूसरे कमरे में सोने चले
गए.यात्रा की थकान होने के कारण आधे घंटे में ही  मुझे और मेरे पति को
गहरी नींद ने आ घेरा.अचानक  फोन की घंटी से आँख खुल गई ,समय देखा तो रात
के दो बज रहे थे ,'आधी रात को किसका फोन है?'' बुदबुदाते  हुए मैंने फोन
उठाया.देखा बगल के कमरे से फोन था. इससे पहले कि मैं कुछ सोचूँ, कुछ
पूछूं,बेटे की आवाज़ सुनाई दी,'' ममा हम आपके ही कमरे में सोना चाहते
हैं.''इतना सुनने के बाद ,फोन को कान से लगाये हुए ही  मैंने दरवाज़ा खोल
दिया.बेटा अपने दरवाज़े पर ही खड़ा बात कर रहा था.मुझे देखते ही बिना
मेरे प्रश्न का इंतजार किये बोला,'' अनु को इस कमरे में बहुत डर लग रहा
है.''अनजानी जगह थी, लेकिन रोहित के साथ होते हुए उसे किस कारण डर लग रहा
है,  बात समझ से परे थी.इसलिए बात को हल्केपन से लेते हुए मैंने दूसरे
कमरे में प्रवेश किया. अन्दर घुसते ही मेरी दृष्टि अनु पर पडी.वह पलंग के
एक कोने में सफ़ेद चादर को सर से ओढ़े हुए दोनोँ हाथोँ से चेहरे को पकडे
हुए काँप रही थी.उसका यह रूप देखकर मुझे बहुत जोर से  हंसी आ गई,.मुझे
हँसते हुए देखकर अनु को अच्छा नहीं लगा. वह  बोली, ''मुझे डर लग रहा है
और आपको हंसी आ रही है.' उसकी बात सुनकर मेरी हंसी रुक गई और  उसके पास
बैठ कर उसे दुलराते हुए मैं बोली,''लेकिन रोहित के पास में
रहते हुए  तुझे किस बात का डर?इसका उत्तर बेटे ने दिया,''ममा, मैं तो सो
गया था, इसने अभी मुझे उठाया और बोली कि यह पिछले  दो  घंटे से सोने की
कोशिश कर रही है,लेकिन इस कमरे में इसे अजीब सा एहसास हो रहा है और इसलिए
 इसे  नींद नहीं आ रही है.पहले तो मुझे भी कोई कारण समझ में नहीं
आया,लेकिन यह देखिये इस खिड़की का एक शीशा टूटा हुआ है इसमें से
साधारणतया जितना  तूफ़ान का शोर और हवा आनी चाहिए उससे कई गुना अधिक आ
रही है.पर्दा अपने आप सरक रहा है. बाहर दरवाज़े की कुंडी ऐसे बज रही है,
जैसे कोई दरवाज़ा खटखटा रहा है.खिड़की से झांक कर बाथरूम से जुड़े छत को
देखिये बाहर का दृश्य कितना डरावना है.''वह सब कुछ एक सांस में कह
गया.मैंने भी उसके कहे अनुसार सारी स्थिति का अवलोकन किया. खिड़की  से
झांक कर देखा  तो पूरी छत पर वृक्षो के सूखे  पत्ते फैले थे जो आंधी के
साथ इधर- उधर उड़ कर भयंकर शोर कर रहे थे.अँधेरे के कारण बाहर का वातावरण
डरावना लग रहा था.दरवाज़े से भी पत्ते टकरा कर कुंडी बजने का आभास दे
रहे होँगे. मुझे कुछ भी अस्वाभाविक नहीं लगा,  होटल के आस पास की स्थिति
ही ऐसी थी. अनु अभी भी उसी स्थिति में बैठी थी.इतनी देर में  मेरे पति भी
शोर सुनकर उठकर आ गए थे.  उनको भी कुछ अजीब नहीं लगा.हमने सोचा तूफानी
रात के कारण बच्चे नई  जगह में  डर गए होँगे, इसलिए  समय की नजाकत को
ध्यान में रखते हुए बात को तूल नहीं दिया. हमारे कमरे में ही अपने  कमरे
से दो गद्दे लाकर ज़मीन पर बिछा कर दोनो बच्चे  लेट गए.एक बार बात पर  तो
विराम लग गया था, लेकिन
लेटे- लेटे मेरे दिमाग में एक बात घूम रही थी कि अनु डरपोक किस्म की लडकी
नहीं है.विवाह के बाद कई बार रात को घर में अकेली रही है.ऑफिस से भी देर
रात अकेले लौटती है.अभी मैं यह सब सोच ही रही थी कि अनु की आवाज़ सुनाई
दी,''ममा,आपको विश्वास नहीं आ रहा है ना कि कमरे में कोई अस्वाभाविक हलचल
थी.मैंने आपको बताया नहीं कि जब मैं ताश खेलते हुए बाथरूम गई थी, तो
वॉशबेसिन में चेहरा धोते हुए मुझे ऐसा एहसास हो रहा था कि वहाँ कोई और भी
है. चेहरा धोते समय वहां लगे शीशे में मुझे अपना ही चेहरा बदला सा लग रहा
थाऔर मैं बहुत डर गई थी."मैंने  भूत- प्रेतो के बारे में पढ़ा और सुना तो
बहुत कुछ था,लेकिन विश्वास कभी नहीं हुआ. अभी भी स्थिति मुझे गंभीर नहीं
लगी. मैंने बोला,''बेटा, कई बार अनजानी जगह पर वहम भी हो जाता है.
इसीलिये कमरे में भी तुझे डर लग रहा था.तूने यह बात रोहित को बताई
क्या?''  ''नहीं, मैं तो अभी यह बात सुन रहा हूँ.'' जवाब बेटे ने दिया.
''तो फिर तू कैसे अनु का डरना उचित मान रहा है?''मैं बोली. उसने जवाब
दिया,''वास्तव में मेरा एक सहकर्मी  भी, जिसने इस होटल के बारे में बताया
था,यहाँ रुका था. रात को वह अपनी पत्नी के साथ   उस   कमरे मैं सो रहा
था, देर रात वह  कमरे  के बाथरूम में   गया . अचानक बाथरूम के  दूसरे
दरवाज़े से ,जो कमरे में नहीं खुलता था,एक औरत, जिसके बाल खुले थे,  आंधी
की तरह  आई   और उसी तरह लौट गई.वह  इतनी शीघ्रता से आई और चली गई कि वह
कुछ भी नहीं समझ पाया.घबराहट में उसे कुछ नहीं सूझा और उसने जल्दी से
कमरे में जाकर बाथरूम के दरवाज़े में कमरे की ओर से कुंडी लगा दी. वह डर
के कारण  कांप रहा था और उसका पूरा शरीर पसीने से भीग गया था. उसको अपनी
आंखो पर विश्वास ही नहीं हो रहा था.उसने सारी घटना के बारे में अपनी
पत्नी को उठा कर बताया.सुनने के बाद पत्नी की क्या प्रतिक्रिया  हुई
होगी, बताने की आवश्यकता नहीं है.  उसने समय देखा सुबह के चार बज रहे
थे.पौ फटते ही वह  बाथरूम  में  सच्चाई जानने के लिए गया.उसने देखा
बाथरूम में एक और दवाजा था.वह यह देखकर आश्चर्यचकित रह गया कि वह दरवाज़ा
बंद था और उसको देखकर ऐसा लग रहा था कि मानो   वह  वर्षों से नहीं खुला
होगा.उसको लगा कहीं उसने सपना तो नहीं देखा था. उसने उसको खोलने की बहुत
कोशिश की, लेकिन वह नहीं खुला.तब उसने कमरे की खिड़की से  झांक कर उस
दरवाज़े के बाहर की स्थिति जाननी  चाही. बाथरूम से वह दरवाज़ा एक छोटी सी
छत  पर खुल रहा था. उस एक कमरे के छत  पर जाने का रास्ता केवल बाथरूम से
ही  था.   अनु भी पहली बार  हमारे साथ यह घटना सुन रही थी. उसका  चेहरा
तो  डर के कारण पीला पड़ गया था.अब मैं और मेरे पति भी सकते में आ गए थे
.कई फिल्मो में देखा है कि यदि   किसी की आत्मा  किसी जीवित व्यक्ति में
प्रवेश कर जाए तो बहुत कठिनाई से पीछा छोडती है.अब सारी स्थिति साफ हो गई
थी.अब एक अंतिम सवाल और मेरे मस्तिष्क को विचलित कर रहा था.मैंने अपने
बेटे से पूछा,''तेरे सहकर्मी के द्वारा इस घटना के बताये जाने के बाद भी,
तू इस होटल में कैसे आया?'' उत्तर में बेटा बोला,''मैंने घटना  को
गंभीरता से लिया ही नहीं. मैंने सोचा इतने यात्री इस होटल में रुकते हैं,
आवश्यक नहीं सबके साथ ऐसा अनुभव हो, लेकिन जब अनु को डरते देखा तो घटना
की पुष्टी हो गई थी,और मैंने उसे गंभीरता से लिया.
सुबह के पांच बज रहे थे. हमने समय बर्बाद ना करते हुए उसी समय सामान
बाँधा और गाड़ी से रवाना हो गए. एक रात और रुकने की चाह ठंडी पड़ चुकी
थी.सारी घटना फ़िल्मी लग रही थी. अवश्य ही किसी लडकी ने किसी की ऐय्याशी
का शिकार होने के बाद बाथरूम से निकल कर छत से खाई में छलांग लगा ली होगी
और उसी की आत्मा भटक रही होगी.

Sunday, May 1, 2011

ऐसी थी सलमा

             विवाह के बाद जब बेटी स्कूल जाने लगी तो विभा ने भी स्कूल में नौकरी करने का मन  बनाया. बरेली  जैसी छोटी  जगह  में दिल्ली की पढाई होने के कारण, शहर के एकमात्र  कॉन्वेंट स्कूल में, मात्र दस मिनट के साक्षात्कार के बाद ही, प्रिंसिपल ने उसे हिंदी अध्यापिका का नियुक्तिपत्र थमा दिया.
           
                                       स्कूल में अध्यापन कार्य करते हुए विभा को ज्ञात हुआ कि दो जुड़वां बहनों में एक का विवाह होने के कारण, उसी के रिक्त स्थान पर ही उसकी नियुक्ति हुई है. दूसरी बहन सलमा उसी का विषय पढाती थी. एक  जैसा  विषय होने के कारण अक्सर उन दोनों की बात-चीत होती रहती थी.बहुत जल्दी दोनों की दोस्ती हो गयी. अपने बाल-सुलभ स्वभाव के कारण विभा थोड़े दिनों में ही स्कूल की युवा अध्यापिकाओं में लोकप्रिय हो गई.

                                   धीरे धीरे विभा के सामने सलमा के व्यक्तिगत जीवन के परदे खुलने लगे. उसके माता-पिता का  तलाक हो चुका था. एक विवाहित भाई था जो कि लखनऊ में रहता था. जुड़वाँ बहन के विवाह  के बाद एकमात्र सलमा ही थी, जो कि शुगर की मरीज अपनी मां का ध्यान रखती थी. उसकी मां भी एक सरकारी स्कूल में कार्यरत थीं.

                                       ये सब बातें विभा को स्कूल की अन्य अध्यापिकाओं से ही ज्ञात हुई थीं. सलमा अपने व्यक्तिगत जीवन की समस्याओं का न के बराबर ही किसी से चर्चा करती थी.  उसकी बातों का आधार तो विशेषतःस्कूल की अध्यापिकाएं, बच्चे तथा नगर की गतिविधियाँ होती थीं. जिसमें अधिकतर व्यंग्य का पुट हुआ करता था. जिसको  सुनकर अध्यापिकाओं की हंसीं के फव्वारे छूटा करते थे. सलमा के ठहाके जब  कभी स्कूल में केवल अध्यापिकाओं को ही बुलाया जाता था , तब एक कोने से दूसरे कोने में गूंजा करते थे.                
                                                           
                                 सलमा बहुत जिंदादिल लड़की थी. अपने काम के प्रति समर्पित होने के कारण तथा स्कूल की सभी गतिविधियों में भाग लेने के कारण वह प्रिंसिपल की चहेती थी.
              इसलिए कुछ अध्यापिकाएं उससे ईर्ष्या भी करती थीं. आत्म संतुष्टि के लिए उसके व्यक्तिगत जीवन पर  छींटाकशी करने से भी नहीं चूकती थीं.
उसके ठहाके उन्हें रत्ती भर भी नहीं सुहाते थे. प्रतिक्रियास्वरूप  वे बुरा सा मुहं बनाकर  आपस में कहतीं, "जाने इस लड़की को कब समझ आएगी ?
"घूमते-घुमाते ये सब बातें सलमा के कानों तक पहुँच जातीं.  लेकिन वह एक कान  से सुनकर दूसरे कान से निकाल देती.  स्कूल की राजनीति से उसे कुछ लेना देना नहीं था.                                
             सलमा भाग्य में बहुत विश्वास रखती थी.उसका कहना होता था कि हम भाग्य के अनुसार कर्म करते हैं. जबकि विभा की सोच ठीक इसके विपरीत थी. दोनों में इस विषय को लेकर बहस भी हो जाती थी. लेकिन सलमा अपनी बात इस विश्वास के साथ कहती थी  कि विभा के पास चुप रहने के अतिरिक्त कोई चारा नहीं होता था.
                                                                  
                                  साथ रहते हुए सलमा की बातों से तथा उसके रख-रखाव से विभा को आभास हुआ कि उसको एक सुन्दर से राजकुमार की बेसब्री से प्रतीक्षा है. अपने वैवाहिक जीवन को लेकर उसने कुछ सपने भी बुन रखे थे. एक बार स्टाफ रूम में चर्चा हो रही थी कि कोइ दसवीं की छात्रा किसी लड़के के साथ भाग गयी है. इसके प्रतिक्रियास्वरूप सलमा बोली, "यार, हमें कोई भगाने वाला नहीं मिलता ,हम भी भागने को तैयार हैं."  यह सुनकर अध्यापिकाएं हँसते-हँसते लोट-पोट हो गईं. ऐसी थी सलमा.                                                                                                                   
                                 जुड़वां बहन के विवाह को पांच साल बीत गए. स्टाफ रूम सलमा के विवाह को लेकर खुसर फुसर होने लगी. कभी कोई  अध्यापिका सलमा से पूछती, "भई मिठाई कब खिला रही हो ? " तो वह बड़े तटस्थ  भाव से माथे पर ऊंगली रख कर बोलती ," मैम,जब नसीब में होगा."                                                                 
                            
                                   समय बीतता गया.लेकिन सलमा के चेहरे से उसके विवाह को लेकर कोई निराशा का भाव नहीं झलकता था. वह अपने रख-रखाव में पूर्ववत जागरूक थी. उसके ठहाकों में भी कोई अंतर नहीं आया.                                                                                
                                 एक दिन अचानक सलमा की मां का हार्ट अटैक से देहांत हो गया. विभा जब उससे मिलने गयी तो वह उससे लिपट कर फूट फूट कर रोने लगी. विभा को समझ नहीं आ रहा था कि वह उसको क्या कह कर उसकी हिम्मत बढ़ाए. अचानक उसके दिमाग में एक विचार  आया, और  बोली,"  तूं तो भाग्य में विश्वास रखती है न ? तेरे भाग्य में तेरी मां का साथ इतने दिनों का ही था." सुनते ही उसकी आँखों में चमक आ गयी और उस ने हाँ में सर हिला दिया.                                       

                                       दसपंद्रह दिन सलमा स्कूल में बहुत उदास रही.  उसको देख कर लगता था कि शायद अब कभी  उसके ठहाके सुनने को नहीं मिलेंगे. वह चुप-चाप अपने कम में लगी रहती थी. उसको देख कर कुछ हितैषी अध्यापिकाएं आपस में बात करतीं, "जाने, सलमा की हंसी को किसकी नज़र लग गयी ? अभी तो मां का रिटायरमेंट  भी नहीं हुआ था. "फिर कुछ अध्यापिकाओं का नाम लेकर मुहं  बिचका लेतीं.                                                                                           
                                  लेकिन समय बहुत बड़ा मरहम है. वह बड़े से बड़ा घाव भी भर देता है. धीरे धीरे सलमा अपने पुराने रूप में आने लगी. फिर से उसके कहकहे गूंजने लगे. देख कर लगता ही नहीं था कि उसके जीवन में कोई कमी भी है. धीरे -धीरे समय बीतता गया. लेकिन उसके जीवन में कोई परिवर्तन नहीं आया. अध्यापिकाएं  उसकी उम्र  को लेकर अटकलें लगाती रहतीं थीं. उनके अनुमान से उसकी उम्र चालीस साल के लगभग  होनी चाहिए थी. लेकिन अभी भी उसके विवाह को लेकर कोई चर्चा होती तो उसका चेहरा नवयौवना  की तरह लाल हो जाता था. जाने किस मिट्टी की बनी थी सलमा?

                                 
विभा के पति जब रिटायर हो गए तो उसने दिल्ली में अपने बच्चों के साथ रहने का विचार बनाया. इसके लिए उसको स्कूल की नौकरी छोड़नी पडी. उसको सलमा का साथ छूटने का बहुत दुःख हो रहा था. लेकिन सलमा तटस्थ ही रही. शायाद  उसे मिलने बिछुड़ने की आदत सी पड़ गयी थी.
                                
                                  दिल्ली में रहते हुए अक्सर विभा की सलमा से फोने पर बात-चीत होती रहती थी. लेकिन एक साल बाद ही यह सिलसिला होली, ईद तक सिमट कर रह गया. क्योंकि यह कोशिश एकतरफा विभा की तरफ से ही थी. लेकिन अन्य अध्यापिकाओं से उसके हाल चाल मिलते  रहते थे.
                                                                                              
                                 एक दिन अचानक एक अध्यापिका का विभा के पास फ़ोन आया,"विभा!  एक बुरी खबर है  ,सलमा अपनी बहन के परिवार के साथ कार में गाजियाबाद से बरेली आ रही थी. रास्ते में उनकी कार की टक्कर एक ट्रक से हो गई.  बहनकी मृत्यु  तो दुर्घटनास्थल पर ही हो गई. सलमा  तथा उसके जीजू को काफी चोटें आई  हैं. बहन के दोनों बच्चे बाल-बाल बच गए.

"             हे ! भगवान् ! "  उसके मुहं से निकला.वह सन्न रह गई, माथा पकड़ कर बैठ गई. उसके दिमाग में उथल- पुथल होने लगी. "तो क्या विधाता ने दोनों बहनों के लिए एक ही वर रचा है?  क्या इसीलिये वह अब तक कुंवारी थी ?"  विभा बुदबुदा रही थी.     
                                  
एक हफ्ते बाद विभा ने सलमा से बात करने की हिम्मत जुटाई. उसने उसको वही भाग्य की दुहाई दी. इससे अधिक कोई तर्क उसको तसल्ली नहीं दे सकता था, यह वह अच्छी तरह जानती थी.  सलमा की उधर से उदास सी आवाज़ आई,  "मैम, मेरा भाई मेरा  निकाह मेरे जीजू से करना चाहता है,  मुझे क्या करना चाहिए ? " विभा ने उत्तर दिया , "देख! सोच समझ कर निर्णय लेना, अपने जीवन के बारे में सोचना. किसी प्रकार का समझौता मत करना. "पहली बार सलमा ने विभा से सलाह ली थी. विभा ने कह तो दिया, लेकिन फ़ोन रखने के बाद उसको अपनी सोच बड़ी खोखली लगी. कहते हैं  जोड़े ऊपर से बन कर आते हैं. तो क्या  विधाता की योजना के अनुसार ही सलमा की बहन की मृत्यु दुर्घटना में हुई थी? इसमें चालक की कोई गलती नहीं थी? यह दुर्घटना भगवन ने ही करवाई थी? उसे लगा भाग्य और कर्म के विवाद में सलमा उससे जीत गई. विभा के दिमाग ने जैसे काम करना ही बंद कर दिया था.