सुमन प्रतिदिन की तरह आज भी बस स्टॉप पर उन घूरती निगाहो को तलाश रही थी. यह उसका प्रतिदिन का काम था और वह भी तो उसको एकटक देखता ही रहता था. वह समझ नहीं पाती आखिर वह उसको क्योँ देखता रहता है. कभी-कभी तो उसका इस तरह देखना उसके लिए असह्य हो जाता था. फिर वह मन ही मन अपना जायजा लेने लगती, सोचती उसमें कुछ भी तो विशेष ऐसा नहीं है, जो किसी को आकर्षित कर सके. पिता की मृत्यु के बाद वह ही अपनी बीमार मां और एक बहन का खर्चा नौकरी करके चला रही थी, इसलिए अपने रख -रखाव पर खर्च करने के लिए उसकी छोटी सी नौकरी में कुछ बचता ही नहीं था. परिवार की ज़िम्मेदारी के बोझ तले दबे होने के कारण, उसकी अपनी इच्छाएँ तो अर्थहीन हो गई थीं. इसलिए चेहरा तो साधारण था ही, युवावस्था की स्वाभाविक सुन्दरता भी लुप्त हो गई थी. उसका चेहरा बुझा-बुझा रहता था. आंखो में रेगिस्तान की तरह सूनापन पसरा रहता था. कुछ भी तो उसमें ऐसा नहीं था कि किसी की निगाहें उस पर टिक जाएं. फिर क्योँ वह उसको देखता रहता है. उसकी घूरती निगाहें उसके मन में एक हलचल सी पैदा कर देतीं.लेकिन जब वह अपनी परिस्थितियो के बारे में सोचती तो उदास हो जाती.
उन घूरती निगाहो का मालिक देखने में सौम्य तथा शिष्ट था. वेश-भूषा से साधारण घर का लगता था. विपरीत परिस्थितियो के होने के बावजूद जब से सुमन उन घूरती निगाहो से परिचित हुई है उसके अंदर एक अजीब सा परिवर्तन आ गया था. अब वह पहले की तरह लापरवाही से तैयार नहीं होती. बस स्टॉप पर जाते हुए उन आंखो को देखने की उत्सुकता के कारण जल्दी- जल्दी कदम बढाती हुई इसी उधेडबुन में खोई-खोई कब घर से बस स्टॉप का लम्बा रास्ता तय कर लेती थी पता ही नहीं चलता था.
आज सुमन को ऑफिस जाने में देर हो गई थी. मां की तबियत खराब होने के कारण घर का सारा काम करके वह जल्दी - जल्दी घर से बस स्टॉप की ओर चली. उसने दूर से देखा बस स्टॉप पर बस का इंतज़ार करने वाले यात्रियो की पंक्ति बहुत लम्बी थी. पंक्ति के आरम्भ से अंत तक उसने आँखे दौडाई. उसकी निगाहें अंत में जा कर टिक गईं. वह भी जैसे उसकी प्रतीक्षा कर रहा था. वह उसके पीछे जाकर खड़ी हो गई.बस में दोनो एक ही सीट पर बैठे. कुछ देर दोनो मौन बैठे रहे. फिर अचानक उस सहयात्री ने सुमन से पूछा, "आप दरियागंज में कहाँ रहती हैं? वह जैसे इस प्रश्न की प्रतीक्षा ही कर रही थी, सकुचाते हुए बोली, "जी, मैं गोलचा के पास ही रहती हूँ." "अच्छा!" कुछ चौकता हुआ वह बोला, " मैं अक्सर वहां जाता रहता हूँ, आप कभी दिखाई नहीं दीं ?" 'इससे पहले कि सुमन कुछ बोले, वह ही अपने बेतुके प्रश्न पर झेपता हुआसा बोला, "मेरा मतलब, वहां मेरा एक मित्र रहता है, ‘रवि’. आप उसे जानती हैं?" सुमन के कुछ बोलने से पहले अपने इस दूसरे बेसिर पैर के प्रश्न का उत्तर भी स्वयं ही दिया, "दिल्ली में जीवन इतना व्यस्त है कि लोग अपने पड़ोसियो के बारे में भी ठीक तरह से नहीं जानते, फिर रवि को आप कैसे जान सकती हैं?"
" सुमन सोच रही थी कि वह क्या बेसिर पैर की बातें कर रहा है. लेकिन फिर भी उसकी बातें उसको अच्छी लग रही थीं. सुमन समझ रही थी कि सुनील क्या पूछना चाह रहा है, इसलिए वह इधर-उधर की बातोँ में समय बर्बाद ना करके बोली , "जी मैं एफ़.ग्यारह में रहती हूँ."
"मैं 'ए'ब्लॉक में रहता हूँ, मेरा नाम सुनील वर्मा है....."
" कनाट सर्कस उतरने वाले आगे आ जाएँ......?" कंडक्टर की आवाज़ आई.
"अच्छा, मैं चलूँ, फिर मिलते हैं. नमस्कार !" सुनील ने कहा और बस से उतर गया.
सुमन रास्ते भर रवि के बारे में ही सोचती रही. उसके नीरस जीवन में उसकी बेतुकी बाते भी मानो रस घोल रही थीं. कितना अधूरा था उसका जीवन, हर रोज़ इसी तरह ऑफिस जाना, वहां फाइलो में सिर खपाना. फिर घर आके बीमार मां के दुखड़े सुनना. अपनी बहन, सीमा की फरमाइशें पूरी करना. अन्य लड्कियो की मां की तरह उसकी मां उसके विवाह की चिंता तो करती थी, लेकिन सुमन के बिना रहने की कल्पना मात्र से वह घबरा उठती थी. आजकल तो उन्होने उसके विवाह की चर्चा करना भी छोड़ दिया था.
उसने भी जैसे अपनी मां-बहन के लिए अपने आप को मिटाने के लिए सोच लिया था. पर यह कुछ दिनोँ से उसे क्या होता जा रहा है. सुनील से मिलने के बाद उसे लगा कि वह स्वार्थी बन जाए. सबको छोड़ कर अन्य लड्कियो की तरह वह भी अपना घर बसा ले और सुख चैन से जीए. लेकिन तभी उसके सामने असहाय तथा बीमार मां की अपराध-बोझ से झुकी हुई निरीह आँखें आ जातीं. तभी कंडक्टर की आवाज़ से उसके विचार तंतुओं को झटका लगा. ऑफिस पहुँच कर भी वह सोच में ही डूबी रही. वह सोच रही थी, कहीं सुनील को लेकर उसकी आशंका निराधार तो नहीं, हो सकता है उसके मन में कुछ भी ना हो. लेकिन झटके से दूसरा विचार उसके स्थान पर आता कि कोई किसी में इतनी दिलचस्पी ऐसे ही नहीं लेता. कुछ दिन ऐसे ही चलता रहा. सुनील प्रतिदिन उसको बड़ी शिष्टता से ''हलो" कहता और यह एक साधारण सा शब्द उसके जीवन में उथल - पुथल मचा देता.
एक दिन रविवार को घर के काम-काज में व्यस्त थी कि अचानक उसकी छोटी बहन आकर बोली, " दीदी, आप से कोई मिलने आया है." वह सोच में पड़ गई कि ऐसा कौन आया है, जिसे उसकी बहन नहीं जानती. सुनील था वह. उसे देख कर वह हैरान सी हुई. उसके अचानक आने से उसे परेशानी भी हुई, जो सुनील की आंखो ने भांप लिया था. इससे पहले कि सुमन कुछ बोले, उसने कहा, "मेरा ऐसे बिना सूचना दिए आना बुरा तो नहीं लगा? यहाँ अपने दोस्त के घर मिलने आया था, सोचा आपसे मिलता चलूँ." "नहीं, आइये-आइये" फिर कमरे में बिखरा सामान समेटते हुए कुछ झेपती सी कुर्सी पर से कपडे हटा कर बोली, "बहुत अच्छा किया, आप बैठिये. मैं अभी आई. छोटी बहन अभी भी पास में खडी सुनील को ऐसे देख रही थी, जैसे वह कोई अजूबा हो. सुमन ने आँख दिखाई तो वह सहम कर बाहर चली गई.
अकेला होने के कारण सुनील कमरे का अवलोकन करने लगा. बहुत पुरानी बेंत की चार कुर्सियां, बीच में बेंत की ही एक टेबल रखी थी . कोने में एक टेबल पर छोटा टी. वी. दीवार पर एक अधेड उम्र के व्यक्ति की फोटो, जिस को माला पहनाई हुई थी. उसको देखकर सुनील को जो आशंका हुई वह बाद में सुमन से बात करने के बाद सत्य में परिवर्तित हो गई थी. परदे भी धुल-धुल कर रंगहीन हो गए थे. कुल मिला कर हर वस्तु अपने मालिक की गरीबी की दास्ताँ कह रहे थे. सुमन ने अन्दर जाकर अपनी मां से कहा, "मेरे ऑफिस का सहकर्मी आया है, ज़रा चाय बना देना और उसके साथ समोसे मंगवा कर रख देना और हाँ जब चाय बन जाए मुझे आवाज़ दे देना, सीमा को मत भेजना. "अपनी छोटी बहन की सुन्दरता से वह अपने को असुरक्षित अनुभव कर रही थी.
सुमन लौट कर जब वह कमरे में आई तो उसने देखा सुनील अखबार पलट रहा था. उसने सुमन से परिचय बढाने हेतु पूछा, "यदि आप बुरा ना माने तो मैं एक बात पूछ सकता हूँ ? आपके परिवार में कौन-कौन हैं? सुमन को लगा जैसे उसके इस प्रश्न ने उसके घाव कुरेद दिए. अपने आप को सँभालते हुए बोली, "पिताजी की मृत्यु सात साल पहले हो गई थी, तब मैंने बी. ए. पास किया ही था, एक छोटी बहन है जो मुझसे पांच साल छोटी है और बी.ए. अंतिम वर्ष में है, मां है, जो अक्सर बीमार ही रहतीं हैं.” "और कोई भाई नहीं है?" सुनील ने पूछा." “नहीं." सुमन ने संक्षिप्त उत्तर देते हुए गहरी सांस ली. सुनील ने सहनुभुति दिखते हुए अपनेपन से पूछा कहा, आपके पिताजी क्या करते थे?" "वे एक प्राइवेट फर्म में नौकरी करते थे, उनके देहांत के बाद उनके स्थान पर ही मुझे नौकरी मिली है." "इसका अर्थ है, मां-बहन की पूरी ज़िम्मेदारी आप पर है ?" सुनील के इस सवाल से उसका गला भर आया लेकिन वह संयत होकर बोली, "छोड़िए , क्या करेंगे जान कर, कोई दूसरी बात कीजिये, अपने बारे में कुछ बताइये." उत्तर में सुनील बोला," मेरे मां- बाप का देहांत मेरे जन्म के चार साल बाद ही एक दुर्घटना में हो गया, मेरे मामा- मामी ने मुझे अनाथ की तरह पाला, जबकि मेरे मां-बाप ने मेरे पालन-पोषण के लिए पर्याप्त धन छोड़ा था. वे लखनऊ में रहते हैं. मैंने एम्.बी.ए. किया है. पिछले पांच सालोँ से एक आई.टी. कंपनी में कार्यरत हूँ. "सुमन बड़े ध्यान से उसकी बात सुन रही थी. इससे पहले किसी ने उसके जीवन में झाँकने की कोशिश नहीं की थी, इसलिए उसकी उदास आँखें एक क्षण को चमक उठीं. अचानक सुनील की नज़र अपनी घड़ी की ओर गई, और उठते हुए बोला,
"आपका बहुत समय ले लिया. अब चलता हूँ, अगर बुरा ना माने तो अपना मोबाईल नं. दे दीजिये." थोडा संकोच से सुमन बोली, "एक मोबाईल है, जो मां के पास रहता है. मैं तो ऑफिस के फोन से काम चला लेती हूँ. "इस जवाब को सुनकर सुनील कुछ झेपते हुए बोला, अच्छा तो मैं चलता हूँ, फिर मिलते हैं."
बस स्टॉप पर तो उनका मिलना होता ही था. अब वह पंद्रह- बीस दिनोँ में उसके घर भी आ जाता था. उसकी मां से भी बहुत आत्मीयता से बात करता था. मां भी उससे उसके हाल-चाल पूछती रहती थी. मां का सहयोग होने के कारण सुनील के आने से सुमन को कोई असुविधा का एहसास नहीं होता था. धीरे-धीरे उसका संदेह कि सुनील उसके साथ विवाह करना चाहता है विश्वास में बदलने लगा था, लेकिन जीवन की सच्चाइयो के बारे में सोचते ही वह असमंजस की स्थिति में हो जाती कि वह क्या करे, क्या ना करे.
एक दिन हमेशा की तरह सुमन सुनील से घर पर बात कर रही थी कि अचानक उसकी छोटी बहन ने उसकी साड़ी, जो कि उसने कुछ खास मौको पर पहनने के लिए खरीद कर रखी थी, पहन कर कमरे में प्रवेश किया और मुस्कुराती हुई बोली, " दीदी, मैं अपनी सहेली की शादी में जा रही हूँ." उसको अपनी साड़ी में देखते ही सुमन का चेहरा तमतमा उठा. उसने उससे साड़ी पहनने की अनुमति लेना भी अनिवार्य नहीं समझा. उसको अपना अस्तित्व अपने घर में मात्र उन लोगोँ की आवश्यकताओं को पूरा करना लगा. उसकी भावनाओं का उनके लिए कोई महत्व नहीं था. ये विचार उसके मन में विद्युत् गति से आये और निकल गए. पर उससे अधिक वह शायद उसका रूप नहीं सहन कर पा रही थी. कितना अंतर है दोनोँ में सत्ताईस साल की सुमन जहां गंभीर और ज़िम्मेदार थी, वहीं बीस साल की सीमा लापरवाह और खिलंदड़ी थी. उसकी उम्र में ही उसने कितनी जिम्मेदारी ओढ़ ली थी. एक सीमा है बिलकुल मस्त.
सीमा जा चुकी थी.
अगले दिन शाम को जब वह ऑफिस से लौटी, तो आते ही उसकी मां ने उसके सर पर हाथ फेरते हुए बोली, " क्योँ बेटा बहुत थक गई है? "सुमन जानती है, उसकी मां को उस पर इतना दुलार तभी आता है जब उसे उससे कोई काम कहना होता है, या कोई बात मनवानी होती थी. इसलिए अनमने मन से उसने कहा, "नहीं, कहिये क्या काम है?" " बेटा, एक बात पूछूं ? यह सुनील कैसा लड़का है?" सुमन इस अप्रत्याशित प्रश्न को सुनकर चौँक गई. उसका मन एक बार को ग्लानि से भर गया. कितनी गलत धारणा थी उसके मन में उसकी मां को लेकर. प्रत्यक्ष में वह उसके विवाह को लेकर चिंता नहीं दिखाती थी, लेकिन अंदर से तो चिंतित रहती होगी. "क्योँ? बहुत अच्छा है." उसने कुछ सकुचाते हुए कहा. " तो फिर अपनी सीमा के लिए उससे बात करके तो देख." मां ने कहा.
सुमन जैसे आसमान से धरती पर गिर पडी.बात उसकी सोच के बिलकुल विपरीत निकली. उसकी आंखो की क्षणिक चमक लुप्त हो गई थी. पलक झपकते ही वह समझ गई, तभी उसकी मां, सुनील के घर आने पर इतनी प्रसन्न होती थी और बड़े मन से उसको उसकी पसंद का खाना बना कर खिलाती थी. कल मां ने ही सीमा को सुनील के सामने साड़ी पहना कर भेजा होगा. वह इसे मां का षड्यंत्र कहे या बेबसी. उसको कुछ समझ नहीं आ रहा था. ये विचार उसके मन में चलचित्र के समान आ-जा रहे थे. उसको लगा वह चिल्ला कर पूछे, “सीमा क्योँ? वह क्योँ नहीं?" तुरंत उत्तर ना मिलते देख मां ने फिर पूछा, "क्या सोचने लगी बेटा? क्योँ तुझे बात पसंद नहीं आई?" '' बात करके देखूंगी मां." सुमन ने तटस्थ भाव से उत्तर दिया.
सुमन हमेशा की तरह कपडे बदलने के बहाने अपने कमरे में गई और अन्दर से दरवाज़ा बंद करके भगवान् की फोटो के सामने फूट-फूट कर रोते हुए बुदबुदाने लगी, "हे भगवान! मुझे यह क्या होता जा रहा है? यह कैसी परीक्षा की घड़ी है? जिस सीमा को मैं इतना प्यार करती थी, अचानक उससे मुझे ईर्ष्या क्योँ होने लगी? मैं इतनी स्वार्थी क्योँ होती जा रही हूँ ? लेकिन मैं भी क्या करूं, मेरी किसे चिंता है? एक ही घर में पैदा हुईं हम दोनो बहनोँ के भाग्य में इतना अंतर क्योँ? आखिर क्योँ......? जैसे वह इन सब सवालोँ का उत्तर भगवान् से मांग रही थी.
थोड़ी देर में अचानक उसने अपने आंसू पौन्छे और मन ही मन कोई निर्णय लिया, जैसे भगवान ने ही उसको कुछ सुझाया हो. अगले दिन वह सुनील का बस स्टॉप पर इंतज़ार कर रही थी....