छब्बीस साल पहले ही इस कहानी की नींव पड़ गई थी.शोभा का विवाहधूम-धामसे हो गया.उस ज़मानेमें न तो कोई लडकी से उसकी पसंद ही पूछता था.न ही उसे बताने का अधिकार ही दियाजाता था.अधिकार नमिलने का अर्थ यह नहीं है कि उसकी कोई इच्छा नहीं होतीथी. लेकिननियति समझ कर उन्हें परिस्थितियो से समझौता करना पड़ता था.परन्तु उसज़माने में भी शोभा अन्य लड़कियो से भिन्न थी.
विभोर को देखकर शोभा को ऐसा कुछभी एहसास नहीं हुआ कि उसको वहजीवन साथी बना ले.परिवार वालो को वह कुछ अनमनी सी दिखाई भीदी, लेकिनकिसी ने इस बात की परवाह नहींकी.मां-बापको लग रहा था कि लड़का खानदानीहै,पढ़ा-लिखाहै, अच्छीनौकरी है और चाहिए ही क्यासुखी वैवाहिक जीवन के लिए?शोभा के पासभी कोई ठोस तर्क नहीं था मनाकरने का.इसलिए उसनेभी प्रत्यक्ष रूप से विरोधनहीं किया.
शोभाबहुत साहसी लडकी थी .वह 'जीयोऔर जीने दो 'मेंविश्वास रखती थी.त्याग कीभावना उसके अन्दर कूट-कूटकर भरी थी.किसी को खुशीदेकर उसे बहुत आत्मसंतुष्टिमिलती थी.उसको लगताथा जीवन जीने के लिए है,बोझ की तरहढ़ोने के लिए नहीं है.विवाह केबाद ससुराल में सबने शोभा का स्वागत किया.लेकिन उसनेपाया कि न तो विभोर के मन मेंही उसके लिए, न ही उसकेमन में विभोर के लिए कोई विशेषखिंचाव है.शोभा को अपनेमन की स्थिति के बारे में तोपता था,लेकिन विभोरके साथ ऐसा क्यो है? वह समझ नहींपा रही थी.उसने सोचाकि उसका स्वभाव ही ऐसा होगा.परन्तु विभोरउसकी हर ज़रुरत का ध्यान बहुतरखता था.विदा के समयमां ने धीरे से विभोर से कहाथा, ''शोभाकी पढाई-लिखाईबेकार न जाये,इस बात काध्यान रखना.''विभोर इसबात को विवाह के बाद भूला नहीं.उसने शोभाको कुछ भी करने की पूरी स्वतंत्रतादे रखी थी.लेकिन वहअपने भविष्य के बारे में सोचे, इससे पहलेही साल भर के अन्दर ही एक प्यारीसी बेटी की मां बन गई.लेकिन विभोरके स्वभाव में कोई परिवर्तननहीं आया.
एकदिन शाम को शोभा अपनी सासको चाय देने के लिए जैसे ही कमरे में घुस रही थी कि विभोरके नाम का जिक्र सुनकर वह दरवाजेपर ही ठिठक कर वह खडीहो गई.उसने सुनाकि उसकी ननद उसकी सास से कहरही थी,''विभोर भैय्याके एक बेटी भी हो गई,लेकिन अभीभी लगता है वे सुमन को भूलेनहीं हैं, आपने उनकाविवाह सुमन से न करवाके सहीनहीं किया." सास को बेटीकी टिप्पणी अच्छी नहीं लगी.उन्होने लापरवाही से जवाब दिया,''समय सब ठीक कर देगा.''यह वार्तालापसुनकरशोभा को जैसे काठ मार गया.कहते हैंठुकराया हुआ प्यार बुझता नहींहै, धुआंछोड़ता रहता है,और यह धुआंशोभा तक भी पहुँच गया था.कुछ पलो केलिए वह भूल गई थी कि उसके हाथमें चाय की ट्रे है.जब उसे होशआया तो वह बनावटी मुस्कान केसाथ कमरे में दाखिल हुई.चाय देकर वहअपने कमरे में आई और फूट-फूटकर रोने लगी.
सारीस्थिति उसके सामने साफ हो गईथी कि विभोर क्यो उससे इतनीदूर-दूररहता है.उसे लगा किउसके साथ धोखा हुआ है.लेकिन इसमेंविभोर की क्या गलती थी,वह ज़माना हीऐसा था जब बच्चो को मां-बापकी इच्छा के आगे नत मस्तक होनाही पडता था.उसने सोचाकि इधर-उधरबात करने से अच्छा है कि वहसीधे विभोर से ही बात करे.उसने मन हीमन कुछ तय किया और विभोर केऑफिस से आने का इंतजार करनेलगी.
शामको जब विभोर ऑफिस से आया तोचाय पीने के बाद बिना कोई भूमिकाबांधे शोभा नेउससेपूछा,'' यह सुमनकौन है ?''विभोर इसप्रश्न के लिए बिलकुल तैयारनहीं था. वह कुछ सोचमें पड गया,और बोला,''क्या करनाहै जानकर?तुम्हेंउसके बारे में किसने बताया?''शोभा ने सारीघटना उसे साफ- साफ बता दी.तब शोभा केबहुत आग्रह करने पर विभोरने बताया कि वह उसके ऑफिस मेंकाम करती थी.वह उससे विवाहकरना चाहता था लेकिन अंतरजातीयहोने के कारण उसके मां-बापने उसे बहु स्वीकार नहीं किया.अब उसने दूसरेशहर में अपना ट्रान्सफर करवालिया है औरउसकाउससे कोई संपर्क नहीं है,लेकिन एक हीऑफिस में होने के कारण उसकाहाल-चालपता चलता रहताहै. ''उसकाविवाह हो गया?'' शोभा नेपूछा.''नहीं हुआ, लेकिन यह सबपूछने से क्या लाभ है ? वह मेरा बीताकल था.''विभोर नेअनमनेपन से उत्तर दिया.'' लाभ है, मैं उससे मिलना चाहती हूँ .मैं यह अधूरीज़िन्दगी नहीं जीना चाहती.मैं तुम्हेंअपने बंधन से मुक्त करती हूँ''शोभा ने अपनीबात पर जोर देते हुए कहा.विभोर यहअप्रत्याशित निर्णय सुनकरहैरान रह गया.''मेरा निर्णयअंतिम है,तुम जब चाहोअपनी बेटी से मिलने आ सकते हो,ज़बरदस्तीएक छत के नीचे एक साथ रहना मुझेस्वीकार नहीं है.'' इतनासुनने के बाद विभोर के चेहरेपर आये खुशी के भाव उससे छुपेनहीं रहे .इस कथन के पीछे शोभा की वास्तविकभावना को वह नहीं जानता था.प्रत्यक्षरूप में जो दिखाई दे रही थीउसी को उसने सत्य माना लिया.
उसकेइस फैसले से मायके वाले खुशनहीं थे.ससुराल वालो के खुश होने का तो कोई सवाल हीनहीं था.शोभा ने फैसलाकिया कि वह किसी पर बोझ नहींबनेगी .उच्च शिक्षाप्राप्त होने के कारण उसे एकआवासीय कॉलेज में लेक्चरारकी नौकरी मिल गई.आरम्भ मेंकई साल तक विभोर अपनी बेटी से मिलने आता रहा.फिर वह कंपनीकी तरफ से विदेश चला गया.उसके बादउसका मां-बेटी से संपर्क ही टूट गया .
कई शुभचिंतको ने शोभा को पुनर्विवाह की सलाहदी. लेकिनवह मन से इसके लिए कभी तैयारनहीं हो पाई.धीरे-धीरेसमय बीतने लगा.शोभा की बेटी ,सौम्या बड़ीहोने लगी.एम.बी.ए.की पढाई पूरीहोने के बाद उसकी अच्छी कम्पनीमें नौकरी भी लग गई.एक दिन सौम्या ने शोभा को बताया कि उसका एकसहकर्मी उससे विवाह करना चाहताहै. शोभाको अपनी बेटी की समझदारी पर पूरा भरोसा था.देखते हीउसको लड़का पसंद आ गया और उसनेविवाह की स्वीकृति दे दी .
विवाहके कुछ महीनो बाद ही पता लगाकि सौम्या के पति को कम्पनीकुछ सालो के लिए अमेरिका भेजरही है.सौम्या बहुतसोच में पड़ गयी कि वह कैसे अपनीमाँ को अकेला छोड़ कर जाए.लेकिन शोभाने उसे बहुत समझाया कि अब तोमोबाइल और इन्टरनेट के कारणदुनिया बहुत छोटी हो गयीहै और विवाह के बाद हर अच्छीलडकी की तरह उसे भी हर हालमें पति का साथ निभाना चाहिए.
जाने से पहले सौम्या ने अपनीमाँ को कम्प्यूटर ऑपरेट करना सिखा दिया.आज के ज़मानेमें कनेक्टिविटी बनाये रखनेके लिए इन्टरनेट सेअच्छा कोई साधन नहीं है.जब चाहे बेटीको वेबकेम पर देख लेती थी,चैटिंग करतेहुए उसको समय का पता ही नहींचलता था.बेटी से दूरीका एहसास बहुत कम हो गया था.उसेसोशल नेटवर्किंगएक चमत्कार से कम नहीं लगा.वह अपने बचपनकी सहेलियो को इसके द्वाराकनेक्ट कर सकती है,जो समय के बहावके साथ जाने कहाँ खो गईं हैं.यह शोभा ने सीखने के बाद ही जाना.
अचानकएक दिन फेसबुक पर एक फ्रेंड रिक्वेस्टदेख कर वह बुरी तरह चौक गई.''अरे!यह तो विनयहै,'' वह मन ही मन बुदबुदाई.उसको अपनीआँखो पर विश्वास ही नहीं होरहा था.उसने उसकाप्रोफाइल खोल कर डिटेल देखा तो उसका संदेह सच निकला.विनय प्रोफाइलफोटो से बिलकुल पहचान में नहींआ रहा था.उम्र ने उसकीतरह विनय पर भी गहरी छाप छोडीथी. पुरानी यादें ताज़ा हो गई.वह अपने तीससाल पहले अतीत में खो गई.वे दोनोंएक ही कॉलेज में पढ़ते थे.एम.ए.की दो सालकी पढाई एक साथ करते हुए, दोनों कबएक दूसरे के करीब आ गए पता हीनहीं चला.इससे पहलेकि दोनों अपने मन की बातकहते,परीक्षासमाप्त होते ही विनय अपने शहरलखनऊ लौट गया.मन की बातमन में ही रह गई.उसकी यादशोभा के मन में एक मीठी कसकबनकर रह गई थी.वह जबकभी किसी का नाम विनय सुनतीतो उसक यादताज़ा हो जाती.धीरे-धीरेयादें भी धूमिल होती चलीगईं.लेकिन आजउसको फिर से सब कुछ याद हो आयाथा. शोभासोच में पड़ गई कि वह फ्रेंडरिक्वेस्ट को एक्सेप्ट करे या नहीं.उसका भी विवाहहो गया होगा,बच्चे होंगे.कहीं उसकापरिवार उसके कारण डिस्टर्बन हो.इसी उहा-पोहमें एक सप्ताह निकल गया.एक दिन उसकाफिर से मेसेज में रिक्वेस्ट आया.उसके दिलमें फिर से उथल-पुथलमच गई उसने अपने मन को समझायाकि ज़माना बदल गया है.अब पहले वाली किसी की सोच नहीं रह गई है. एक बार बातकरके देखे तो,वह क्या चाहताहै. यह सोच करउसने एक्सेप्ट टैब को उंगली से दबा दिया.
फ्रेंडलिस्ट में ऐडहोतेही वह ऑन लाइन दिखाई दिया.एकदम उसीसमय चैट मैसेजआया,''हेलो,कैसी हो ?''जैसे वह उसकेफ्रेंड लिस्ट में ऐडहोनेका इंतज़ार ही कर रहा था.शोभा को बड़ाअजीब सा लग रहा था, इतने सालबाद उससे बात करते हुए.उसके दिल कीधड़कनें बढ़ गईं.लेकिन जवाबतो देना ही था.उसने लिखा,''ठीक हूँ'' विनयने उसके परिवार के बारे मेंजानना चाहा तो उसने सारीस्थिति सच-सचबता दी.अब शोभा कीबारी थी उसके बारे में जाननेकी. उसनेपूछा,''तुम्हारी पत्नी कैसी है? कितने बच्चेहैं?''विनय नेकहा,''शादी हीनहीं की.'' '' क्यो?''शोभा ने चौककर पूछा,''तुम्हारीजैसी कोई मिली ही नहीं”,“शोभा केवैवाहिक जीवन के बारे में पतालगने के बाद विनय की हिम्मतबढ़ गई थी.जो अब तक वहनहीं कह पाया था,वह उसने कहदिया.शोभा कोयह एक सपने जैसा लग रहा था,सबकुछ अप्रत्याशित. इसेकुदरत का करिश्मा कहें यासाइंस की देन कहें.शोभा के सामनेउसके अपने भविष्य की तस्वीरसाफ होने लगी थी.जो शोभा नेसोचा वही सच निकला.विनय ने बतायाकि वह उसको कभी भुला नहीं पाया और वह शेष जीवन उसके साथबिताना चाहता है.अजीब सीहलचल उसके मन में होने लगी.विनय से मिलनके मीठे एहसास मात्र से ही उसका मन पुलकित हो उठा. उसकोलगा कि उसके पति के लिए त्याग काही प्रतिफल उसे मिलाहै. उसनेइसे अपने भाग्य का चमत्कारसमझकर स्वीकार कर लिया.वह सोचनेलगी कि काश यह इन्टरनेट उसकेज़माने में भी होता तो इतने दिनके अकेलेपन की त्रासदी उसेनहीं झेलनी पड़ती लेकिन कहागया है न कि 'जब-जबजो-जोहोना है.तब-तब सो-सोहोता है'. अपनी बेटीकी इस ज़माने की सोच को तो वहजानती ही थी.अपनी मां कीखुशी के लिए वह कुछ भी करसकती थी.
-सुधा कसेरा ,
No comments:
Post a Comment