Tuesday, April 30, 2013



              आज की ज्वलंत समस्या 'बलात्कार' के बारे में आप लोगों से अपने विचार बांटना, एक अध्यापिका होने के नाते  अपना नैतिक कर्तव्य समझती हूँ। उससे आप लोग सहमत हों या न हों यह आप लोगों का अपना दृष्टिकोण है।
सबसे पहले मैं यह कहना चाहती हूँ कि इस कुकृत्य से महिलायें शारीरिक से अधिक मानसिक रूप से प्रताड़ित होती हैं। यह तो भुक्त भोगी ही समझ सकता है, हम तो केवल कल्पना मात्र से ही आतंकित हो जाते हैं। संविधान ने पुरुषों और महिलाओं को बराबर के अधिकार  दिए हैं लेकिन जब हमारे शरीर पर ही हमारा पूरा अधिकार नहीं है तो बाकी के अधिकारों  की  क्या उपयोगिता है? भगवान ने  महिलाओं की शारीरिक संरचना ही  ऐसी की है। उसकी रक्षा के लिए हमेंबहुत बार   पुलिस और क़ानून की सहायता लेनी पड़ती है लेकिन यदि हम अपनी सीमाएं न लांघे तो शायद इसकी आवश्यकता ही ना पड़े। क्यों नहीं हम बचाव  का रास्ता अपनाकर ऐसे मौकों को निमंत्रण ही न दें। अपना पहनावा शालीनता पूर्वक पहनें।देर रात तक   बाहर ना रहें, और यदि कभी मजबूरी में रहना भी पड़े तो लौटने   के सही  साधन का प्रयोग करें। बच्चो! पिछले दिनों महिलाओं ने ' दामिनी' के केस में नारेबाजी करके पुरुषों के लिए  यह दलील दी कि ' वे क्यों रात को देर तक बाहर ना रहें?पुरुष बाहर देर तक रहना छोड़ दें', वे क्यों शालीन  कपडे पहनें? पुरुष अपनी आँखें बंद कर ले' ,' जो महिलायें साडी और सूट पहनती  हैं उनका  भी या छोटी- छोटी बच्चियों का बलात्कार क्यों होता 'है? यह सब नारे लगाकर या दलीलें देकर  हम केवल अपने आप को धोखा दे रहे हैं और सच्चाई से भाग रहे हैं। इनमें से अधिकतर घटनाएं हमारी लापरवाही के कारण होती  है। अपनी छोटी  बच्चियों को सुरक्षित स्थानों पर ही छोड़े, उन पर कड़ी नज़र रखें और आमिरखान के शो में जो शिक्षा उसने बच्चियों को दी थीं वह आप भी अपनी बच्चियों को दें,जिससे समस्या पूरी तरह   समाप्त नहीं होंगी तो बहुत कम अवश्य  हो जायेंगी।  यहाँ पर यह कहावत भी  चरितार्थ होती है कि 'आटे  के साथ घुन भी   भी पिस जाता है '। इन दलीलों और नारेबाज़ी से   क्या बलात्कार की संख्या में कमी आई है? नहीं ना !   समाज और पुलिस के विकृत रूप से हम  सभी   भली - भांति परिचित हैं और हम यह भी जानते हैं कि उनको   सुधारना भी तब तक  असंभव है, जब तक वह स्वयम न चाहे तो क्यों नहीं हम अपने ही  रहन - सहन और व्यवहार में  सुधार  ले आयें और बचाव का रास्ता अपना लें? महिलाओं की यह भी दलील है कि पहले ज़माने में भी सीमा में रहने के बावजूद बलात्कार होते थे,लेकिन मीडिया वर्तमानकाल के जैसे सशक्त न होने के कारण प्रकाश में नहीं आती थीं । यह भी केवल भ्रम है, उस समय अधिकतर ऐसी घटनाएं  अशिक्षित परिवारों के अन्दर ही हुआ करती थीं । इस तरह खुलेआम सड़कों पर नहीं होती थीं । कभी एक- आध घटना होती थी तो वह सारे देश के सामने ऐतिहासिक घटना का रूप लेकर आती थी। और उसको पुलिस पकड़ कर ही दम लेती थी। मुझे इसी तरह की दिल्ली की  एक चोपड़ा बच्चों  की घटना  और उनके कथित अपराधी रंगा, बिल्ला की याद आज भी है। उस घटना के बारे में पता लगने पर सारा देश सकते में आ गया था

No comments:

Post a Comment