Monday, March 12, 2012

वह एक रात!!!!!


 हैदराबाद   में रहते हुए कई  वर्ष हो गए  थे,लेकिन अभी तक शिव जी के
प्रसिद्द मंदिर श्रीसेलम जाने का सौभाग्य प्राप्त नहीं हुआ था.यहां के
निवासिओं से श्रीसेलम मंदिर के बारे में ज्ञात हुआ, कि यह शिवजी का मंदिर
प्रसिद्द बारह शिवलिंगो में से एक है.हैदराबाद से यह लगभग २२0 किलोमीटर
दूर है और यह चारोँ ओर से मनोरम पर्वतो और घाटिओं से घिरा हुआ है.वहां की
प्राकृतिक शोभा देखते  ही बनती है और यह भी पता चला कि वहां जाने के लिए
सबसे अच्छा साधन  अपनी गाड़ी या टैक्सी है.  अपने पति, बेटे रोहित और बहू
अनु, जिनका विवाह एक वर्ष पहले ही हुआ था, के विवाह के वर्षगाँठ पर
श्रीसेलम मंदिर  जाने की योजना बनाई.
                      घर से सुबह पांच बजे यात्रा के लिए रवाना हो गए.
रास्ते में रुकते- रुकाते  लगभग छः घंटे में मंदिर के गेट पर
पहुंचे.लेकिन गेट के बाद  भी   दो- तीन किलोमीटर फैले हुए   एक घने जंगल
से  गुज़रना पड़ा. अँधेरा होते ही जंगल से गुज़रने वालो को रोकने के लिए
बैरियर लग जाते हैं.  क्योँकि  उस जंगल में जंगली जानवर खुले घूमते हैं.
उसके बाद चार-पांच किलोमीटर घाट का रास्ता है. पहले जंगल में जंगली
जानवरो को एक झलक देखने के लिए आँखें इधर से उधर फिसल रही थीं.  उसके बाद
घाट से गुज़रते समय प्रकृति की शोभा देखते समय मानो आँखे उन पर बर्फ की
तरह जम रही थीं.जुलाई का  महीना होने के कारण बारिश की हल्की फुहार पड़
रही थी.कहने की आवश्यकता नहीं है कि बारिश के पानी में नहाई हुई घाटियाँ
बहुत मनमोहक लग रही थीं. घाटियाँ पार करते ही हमारी गाड़ी एक  होटल के
सामने रुकी.इस होटल के बारे में रोहित को उसके एक मित्र ने बताया था कि
उस होटल से प्रकृति की सुन्दरता देखते ही बनती है.उसमें हमने चलने से
पहले ही बुकिंग करवा ली थी.  होटल में पहुँचने के बाद पता चला कि उसमें
पहली मंजिल पर दो ही कमरे यात्रिओं  के ठहरने  के लिए बने हैं.नीचे होटल
के रख रखाव के लिए कर्मचारी रहते थे.

कमरे  में सामान रखने के बाद कमरो के पीछे एक बड़ी सी बालकनी बनी थी,
उसमें हम चारो चले गए.बालकनी की रेलिंग पकड़ कर खड़े हो गए.वहाँ से
प्रकृति का सौन्दर्य
                                देखकर मन पुलकित हो गया.बालकनी के नीचे
एक खाई थी, जिसमें एक नदी बह रही थी.बड़े- बड़े वृक्ष थे, ठंडी बयार
बारिश के पानी की फुहार  को ठेलते हुए बालकनी को भिगो रही थी और अब वे ही
 बूंदें  हमारे शरीर से अठखेलियाँ कर रही थीं.दृश्य इतना मनमोहक था कि
हमारे  रास्ते की थकान छूमंतर हो गई.वहाँ से हटने का मन ही नहीं हो रहा
था.लेकिन जिस काम के लिए आये थे वह भी ज़रूरी था.हम लोग तैयार होकर मंदिर
गए, जो होटल के पास ही था.लौटते हुए शाम हो गई.रास्ते में हमने एक
रेस्तरां में चाय पी.उसके बाद  होटल में पहुँच कर हम बालकनी में
कुर्सियां बिछा कर बैठ गए.सब कुछ सपने जैसा लग रहा था.थोड़ी  ही देर में
अँधेरा छा गया और वातावरण की सारी ख़ूबसूरती अन्धकार में छिप गई.बस दूर
जलते हुए बल्बो की पंक्ति टिमटिमा रही थी.अब अँधेरे में बाहर बैठना बेकार
था. इसलिए हम सभी कमरे में आ गए. कमरा और बाथरूम देखकर लग रहा था  कि
होटल बहुत पुराना होगा.लेकिन फिर भी वहाँ के प्राकृतिक दृश्य के आगे सब
कुछ महत्वहीन था.दो रातें हमें वहाँ गुजारनी थीं. खाने का बहुत सारा
सामान साथ लेकर आए थे.सबने मिलकर खाना खाया.रात के ९ बज चुके  थे. अँधेरे
में कहीं जाने का कोई मतलब नहीं था यात्रा का भरपूर आनंद लेने के लिए हम
सबने ताश  खेलने की सोची.अभी खेलना आरम्भ किया ही था  कि अचानक जोर की
आंधी चलने लागीऔर बारिश पड़ने लगी, जिसने थोड़ी ही  देर में  भयंकर
तूफ़ान का रूप ले लिया था .बारिश का पानी कमरे के दरवाज़े को पार करने
लगी तो हमने दरवाज़ा बंद कर लिया.पूरी बालकनी वृक्षो के सूखे  पत्तो से
भर गई थी.वे कमरे के दरवाज़े से भी टकरा रहे थे.ताश खेलते- खेलते कब रात
के ग्यारह बज गए पता ही नहीं चला.अचानक खेल को रोकते हुए अनु बोली ''मैं
ज़रा बाथरूम होकर आती हूँ.''पांच मिनट में ही वह गीला चेहरा पौछते हुए
लौटी.अभी किसी को नींद नहीं आ रही रही थी, इसलिए गेम जारी रहा.रात के
बारह बजे हमने सोने का विचार किया,जिससे अपनी नींद पूरी करके प्रातः
उठकर यात्रा का पूरा आनंद उठा सकें.रोहित और अनु दूसरे कमरे में सोने चले
गए.यात्रा की थकान होने के कारण आधे घंटे में ही  मुझे और मेरे पति को
गहरी नींद ने आ घेरा.अचानक  फोन की घंटी से आँख खुल गई ,समय देखा तो रात
के दो बज रहे थे ,'आधी रात को किसका फोन है?'' बुदबुदाते  हुए मैंने फोन
उठाया.देखा बगल के कमरे से फोन था. इससे पहले कि मैं कुछ सोचूँ, कुछ
पूछूं,बेटे की आवाज़ सुनाई दी,'' ममा हम आपके ही कमरे में सोना चाहते
हैं.''इतना सुनने के बाद ,फोन को कान से लगाये हुए ही  मैंने दरवाज़ा खोल
दिया.बेटा अपने दरवाज़े पर ही खड़ा बात कर रहा था.मुझे देखते ही बिना
मेरे प्रश्न का इंतजार किये बोला,'' अनु को इस कमरे में बहुत डर लग रहा
है.''अनजानी जगह थी, लेकिन रोहित के साथ होते हुए उसे किस कारण डर लग रहा
है,  बात समझ से परे थी.इसलिए बात को हल्केपन से लेते हुए मैंने दूसरे
कमरे में प्रवेश किया. अन्दर घुसते ही मेरी दृष्टि अनु पर पडी.वह पलंग के
एक कोने में सफ़ेद चादर को सर से ओढ़े हुए दोनोँ हाथोँ से चेहरे को पकडे
हुए काँप रही थी.उसका यह रूप देखकर मुझे बहुत जोर से  हंसी आ गई,.मुझे
हँसते हुए देखकर अनु को अच्छा नहीं लगा. वह  बोली, ''मुझे डर लग रहा है
और आपको हंसी आ रही है.' उसकी बात सुनकर मेरी हंसी रुक गई और  उसके पास
बैठ कर उसे दुलराते हुए मैं बोली,''लेकिन रोहित के पास में
रहते हुए  तुझे किस बात का डर?इसका उत्तर बेटे ने दिया,''ममा, मैं तो सो
गया था, इसने अभी मुझे उठाया और बोली कि यह पिछले  दो  घंटे से सोने की
कोशिश कर रही है,लेकिन इस कमरे में इसे अजीब सा एहसास हो रहा है और इसलिए
 इसे  नींद नहीं आ रही है.पहले तो मुझे भी कोई कारण समझ में नहीं
आया,लेकिन यह देखिये इस खिड़की का एक शीशा टूटा हुआ है इसमें से
साधारणतया जितना  तूफ़ान का शोर और हवा आनी चाहिए उससे कई गुना अधिक आ
रही है.पर्दा अपने आप सरक रहा है. बाहर दरवाज़े की कुंडी ऐसे बज रही है,
जैसे कोई दरवाज़ा खटखटा रहा है.खिड़की से झांक कर बाथरूम से जुड़े छत को
देखिये बाहर का दृश्य कितना डरावना है.''वह सब कुछ एक सांस में कह
गया.मैंने भी उसके कहे अनुसार सारी स्थिति का अवलोकन किया. खिड़की  से
झांक कर देखा  तो पूरी छत पर वृक्षो के सूखे  पत्ते फैले थे जो आंधी के
साथ इधर- उधर उड़ कर भयंकर शोर कर रहे थे.अँधेरे के कारण बाहर का वातावरण
डरावना लग रहा था.दरवाज़े से भी पत्ते टकरा कर कुंडी बजने का आभास दे
रहे होँगे. मुझे कुछ भी अस्वाभाविक नहीं लगा,  होटल के आस पास की स्थिति
ही ऐसी थी. अनु अभी भी उसी स्थिति में बैठी थी.इतनी देर में  मेरे पति भी
शोर सुनकर उठकर आ गए थे.  उनको भी कुछ अजीब नहीं लगा.हमने सोचा तूफानी
रात के कारण बच्चे नई  जगह में  डर गए होँगे, इसलिए  समय की नजाकत को
ध्यान में रखते हुए बात को तूल नहीं दिया. हमारे कमरे में ही अपने  कमरे
से दो गद्दे लाकर ज़मीन पर बिछा कर दोनो बच्चे  लेट गए.एक बार बात पर  तो
विराम लग गया था, लेकिन
लेटे- लेटे मेरे दिमाग में एक बात घूम रही थी कि अनु डरपोक किस्म की लडकी
नहीं है.विवाह के बाद कई बार रात को घर में अकेली रही है.ऑफिस से भी देर
रात अकेले लौटती है.अभी मैं यह सब सोच ही रही थी कि अनु की आवाज़ सुनाई
दी,''ममा,आपको विश्वास नहीं आ रहा है ना कि कमरे में कोई अस्वाभाविक हलचल
थी.मैंने आपको बताया नहीं कि जब मैं ताश खेलते हुए बाथरूम गई थी, तो
वॉशबेसिन में चेहरा धोते हुए मुझे ऐसा एहसास हो रहा था कि वहाँ कोई और भी
है. चेहरा धोते समय वहां लगे शीशे में मुझे अपना ही चेहरा बदला सा लग रहा
थाऔर मैं बहुत डर गई थी."मैंने  भूत- प्रेतो के बारे में पढ़ा और सुना तो
बहुत कुछ था,लेकिन विश्वास कभी नहीं हुआ. अभी भी स्थिति मुझे गंभीर नहीं
लगी. मैंने बोला,''बेटा, कई बार अनजानी जगह पर वहम भी हो जाता है.
इसीलिये कमरे में भी तुझे डर लग रहा था.तूने यह बात रोहित को बताई
क्या?''  ''नहीं, मैं तो अभी यह बात सुन रहा हूँ.'' जवाब बेटे ने दिया.
''तो फिर तू कैसे अनु का डरना उचित मान रहा है?''मैं बोली. उसने जवाब
दिया,''वास्तव में मेरा एक सहकर्मी  भी, जिसने इस होटल के बारे में बताया
था,यहाँ रुका था. रात को वह अपनी पत्नी के साथ   उस   कमरे मैं सो रहा
था, देर रात वह  कमरे  के बाथरूम में   गया . अचानक बाथरूम के  दूसरे
दरवाज़े से ,जो कमरे में नहीं खुलता था,एक औरत, जिसके बाल खुले थे,  आंधी
की तरह  आई   और उसी तरह लौट गई.वह  इतनी शीघ्रता से आई और चली गई कि वह
कुछ भी नहीं समझ पाया.घबराहट में उसे कुछ नहीं सूझा और उसने जल्दी से
कमरे में जाकर बाथरूम के दरवाज़े में कमरे की ओर से कुंडी लगा दी. वह डर
के कारण  कांप रहा था और उसका पूरा शरीर पसीने से भीग गया था. उसको अपनी
आंखो पर विश्वास ही नहीं हो रहा था.उसने सारी घटना के बारे में अपनी
पत्नी को उठा कर बताया.सुनने के बाद पत्नी की क्या प्रतिक्रिया  हुई
होगी, बताने की आवश्यकता नहीं है.  उसने समय देखा सुबह के चार बज रहे
थे.पौ फटते ही वह  बाथरूम  में  सच्चाई जानने के लिए गया.उसने देखा
बाथरूम में एक और दवाजा था.वह यह देखकर आश्चर्यचकित रह गया कि वह दरवाज़ा
बंद था और उसको देखकर ऐसा लग रहा था कि मानो   वह  वर्षों से नहीं खुला
होगा.उसको लगा कहीं उसने सपना तो नहीं देखा था. उसने उसको खोलने की बहुत
कोशिश की, लेकिन वह नहीं खुला.तब उसने कमरे की खिड़की से  झांक कर उस
दरवाज़े के बाहर की स्थिति जाननी  चाही. बाथरूम से वह दरवाज़ा एक छोटी सी
छत  पर खुल रहा था. उस एक कमरे के छत  पर जाने का रास्ता केवल बाथरूम से
ही  था.   अनु भी पहली बार  हमारे साथ यह घटना सुन रही थी. उसका  चेहरा
तो  डर के कारण पीला पड़ गया था.अब मैं और मेरे पति भी सकते में आ गए थे
.कई फिल्मो में देखा है कि यदि   किसी की आत्मा  किसी जीवित व्यक्ति में
प्रवेश कर जाए तो बहुत कठिनाई से पीछा छोडती है.अब सारी स्थिति साफ हो गई
थी.अब एक अंतिम सवाल और मेरे मस्तिष्क को विचलित कर रहा था.मैंने अपने
बेटे से पूछा,''तेरे सहकर्मी के द्वारा इस घटना के बताये जाने के बाद भी,
तू इस होटल में कैसे आया?'' उत्तर में बेटा बोला,''मैंने घटना  को
गंभीरता से लिया ही नहीं. मैंने सोचा इतने यात्री इस होटल में रुकते हैं,
आवश्यक नहीं सबके साथ ऐसा अनुभव हो, लेकिन जब अनु को डरते देखा तो घटना
की पुष्टी हो गई थी,और मैंने उसे गंभीरता से लिया.
सुबह के पांच बज रहे थे. हमने समय बर्बाद ना करते हुए उसी समय सामान
बाँधा और गाड़ी से रवाना हो गए. एक रात और रुकने की चाह ठंडी पड़ चुकी
थी.सारी घटना फ़िल्मी लग रही थी. अवश्य ही किसी लडकी ने किसी की ऐय्याशी
का शिकार होने के बाद बाथरूम से निकल कर छत से खाई में छलांग लगा ली होगी
और उसी की आत्मा भटक रही होगी.

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