Wednesday, April 20, 2011

मेरे हिस्से का दुःख



                                     मैं किसी मंदिर के भ्रमण के लिए सपरिवार निकली थी. रास्ते में ही पिताजी के पड़ोसी का उनकी मृत्यु का समाचार देने के लिये फोन आया। थोड़े दिन पहले ही उनकी तबियत खराब होने का समाचार भी उन्हीं से मिला था। चाह कर भी मै उन्हें देखने नही गयी । बस उनका हाल-चाल पूछने के लिये एक फोन मिला लिया था। नौकर फोन उठा कर उनकी नाज़ुक स्थिति के बारे में बता ही रहा था कि उसको बुलाने के लिये पिताजी की ज़ोर् से आवाज़ सुनाई दी। आवाज़ सुनते ही मै फूट -फूट कर रोने लगी. मेरे होंठ बुदबुदाने लगे, “जाने वे किस हालत में होंगे ? घर का तो उनके पास कोई भी नहीं है. ” लेकिन मैं नहीं गई तो नहीं गई.

                                 मां की मृत्यु के बाद उनकी बरसी पर हीमैंने कसम खा ली थी कि अब उस घर में कदम भी नहीं रखूँगी. और उसका पालन आज- तक किया. पिताजी की मृत्यु का समाचार मिलने पर मेरे पति बोले, ''खुशी में जाओ या न जाओ, दुःख में ज़रूर जाना चाहिए'' मैंने छूटते ही कहा, ''किसका दुःख, मरने वाले का दुःख या जीने वाले भाई - बहन का दुःख? वास्तविक दुःख तो मेरे साथ है. '' मेरे पति सब जानते थे इसलिए मेरा उत्तर सुनकर चुप हो गए.

                               मैं सोच में पड़ गई और अतीत की स्मृतियाँ ताज़ा होकर हवा में लहराने लगीं. पिताजी ने हम भाई- बहनों को पढ़ाया-लिखाया. समाज में सर उठा कर जीने लायक बनाया. लेकिन पिता का प्यार क्या होता है, यह हम भाई-बहनों ने कभी नहीं जाना. उनके तानाशाह स्वभाव के आगे किसी की नहीं चलती थी . मां को तो वे अपनी जायदाद समझते थे. उनको सिर्फ अपने आप से प्यार था.

                       मां की मृत्यु भी एक रहस्य बनकर रह गई थी. अपने अकेलेपन से और पिताजी के अत्याचारों से तंग आकर उन्होंने स्वयं ही आग लगा ली थी या पिताजी ने उनके डिप्रेशन की बीमारी के कारण उनसे छुटकारा पाने के लिए उनको आग लगा दी थी.जब पुलिस ने उनसे बयान लिया तो उन्होंने कहा कि चाय बनाते समय जलती हुई तीली उनके हाथ से छूटकर ज़मीन पर गिर गई थी और उनकी साड़ी ने आग पकड़ ली थी. जबकि रसोई में ऐसा कोई चिन्ह नहीं पाया गया. वाह रे !भारतीय नारी , मरते समय भी झूठ बोलकर अपने पति को जीवन दान दे गई. किसी ने आवाज़ ही नहीं उठाई तो पुलिस भी क्या करती.

                        रिवाज़ के अनुसार जब आख़िरी बार पिताजी मां की मांग में सिन्दूर भरने लगे तो मन हुआ कि चिल्लाकर कहूं. ''अब तो उन्हें चैन से जाने दीजिये.'' लेकिन जानती थी कि मेरी आवाज़ भीड़ में खो जायेगी. इसलिए चुप रहना ही ठीक समझा.

                          मां के जल जाने का कारण जानने की किसी भाई- बहन को जिज्ञासा नहीं थी. क्योंकि वे भी मां की दुर्दशा केलिए बराबर के भागीदार थे. पिताजी के अत्याचार तो हमने होश संभालने के बाद से ही देखा था. मां को कभी हम उनके साथ अकेला नहीं छोड़ते थे.

                            लेकिन विवाह होते ही दोनों भाई पिताजी से छुटकारा पाने के लिए व्यवसाय के बहाने दूसरे शहरों में जाकर बस गए. और मां की समस्याओं को जानते-बूझते अनदेखा करने लगे.

                           मैं अपने विवाह के पहले जितनी साहसी थी, मां और भाइयों के लिए पिताजी से विद्रोह करती थी, उतनी ही बाद में आर्थिक स्थिति कमज़ोर होने के कारण तथा पति के असहयोग के कारण मानसिक रूप से अशक्त हो गई.

                           मैं मां से मिलने जाती और उनकी हालत देखकर आँखों में आंसू लेकर असहाय लौट आती. भाइयों की उदासीनता देखकर उनसे कुछ कहने का मन ही नहीं करता था. उनके लिए मां एक बेकार सामान से अधिक कुछ नहीं थी.
       

                           मां के जल जाने की खबर सुनकर जब में उनके घर गई तो देखा कि अथाह पैसा होने के बावजूद भाइयों ने उनको एक सरकारी अस्पताल में मरने के लिए छोड़ दिया था. मां की अस्थियाँ हरिद्वार में विसर्जित करने के बाद दोनों भाइयों को गाड़ी के पेट्रोल के खर्चे का बंटवारा करते देखकर मन रो उठा. छोटी भाभी तो कभी मां को अपने दिए गए सोने के बुँदे ढूँढने में लगी थी. बड़ी वाली की नज़र मां की आलमारी पर लगी थी.

                               जिस मां ने पिताजी के असहयोग के बावजूद जिन बच्चों को अपना खून सींच कर पाला था,उनका खून इतना सफ़ेद कैसे हो सकता है? कहते हैं कि बेटी को बेटों से अधिक मां-बाप से हमदर्दी होती है. लेकिन यहाँ तो बहन भी भाइयों के रंग में रंगी थी. एक ही घर में पैदा हुईं हम दोनों बहनों के स्वभाव में इतना अंतर कैसे है ? मेरी समझ से बाहर की बात है.

                                पिताजी की मृत्यु की खबर मिलते ही तीनों भाई- बहन मौके पर पहुँच गए. उनके जीतेजी उस घर में किसी ने कदम नहीं रखा, उनके जाते ही उस घर में उन लोगों ने जाने की कैसे हिम्मत जुटाई होगी, वे ही जाने. मेरा तो उन लोगों से मां की मृत्यु के बाद से सम्बन्ध समाप्त प्रायः हो गया था. मैं स्वयं तो नहीं गई लेकिन अपने बेटे को वहाँ भेजा, जिससे कि वहाँ की गतिविधियों की जानकारी मिल सके. बेटे ने जो आकर बताया उसको सुनकर लगा कि अच्छा ही हुआ, वहाँ न जाकर, वो सब देखने से मैं बच गई.