विवाह के बाद जब बेटी स्कूल जाने लगी तो विभा ने भी स्कूल में नौकरी करने का मन बनाया. बरेली जैसी छोटी जगह में दिल्ली की पढाई होने के कारण, शहर के एकमात्र कॉन्वेंट स्कूल में, मात्र दस मिनट के साक्षात्कार के बाद ही, प्रिंसिपल ने उसे हिंदी अध्यापिका का नियुक्तिपत्र थमा दिया.
स्कूल में अध्यापन कार्य करते हुए विभा को ज्ञात हुआ कि दो जुड़वां बहनों में एक का विवाह होने के कारण, उसी के रिक्त स्थान पर ही उसकी नियुक्ति हुई है. दूसरी बहन सलमा उसी का विषय पढाती थी. एक जैसा विषय होने के कारण अक्सर उन दोनों की बात-चीत होती रहती थी.बहुत जल्दी दोनों की दोस्ती हो गयी. अपने बाल-सुलभ स्वभाव के कारण विभा थोड़े दिनों में ही स्कूल की युवा अध्यापिकाओं में लोकप्रिय हो गई.
धीरे धीरे विभा के सामने सलमा के व्यक्तिगत जीवन के परदे खुलने लगे. उसके माता-पिता का तलाक हो चुका था. एक विवाहित भाई था जो कि लखनऊ में रहता था. जुड़वाँ बहन के विवाह के बाद एकमात्र सलमा ही थी, जो कि शुगर की मरीज अपनी मां का ध्यान रखती थी. उसकी मां भी एक सरकारी स्कूल में कार्यरत थीं.
ये सब बातें विभा को स्कूल की अन्य अध्यापिकाओं से ही ज्ञात हुई थीं. सलमा अपने व्यक्तिगत जीवन की समस्याओं का न के बराबर ही किसी से चर्चा करती थी. उसकी बातों का आधार तो विशेषतःस्कूल की अध्यापिकाएं, बच्चे तथा नगर की गतिविधियाँ होती थीं. जिसमें अधिकतर व्यंग्य का पुट हुआ करता था. जिसको सुनकर अध्यापिकाओं की हंसीं के फव्वारे छूटा करते थे. सलमा के ठहाके जब कभी स्कूल में केवल अध्यापिकाओं को ही बुलाया जाता था , तब एक कोने से दूसरे कोने में गूंजा करते थे.
सलमा बहुत जिंदादिल लड़की थी. अपने काम के प्रति समर्पित होने के कारण तथा स्कूल की सभी गतिविधियों में भाग लेने के कारण वह प्रिंसिपल की चहेती थी.
इसलिए कुछ अध्यापिकाएं उससे ईर्ष्या भी करती थीं. आत्म संतुष्टि के लिए उसके व्यक्तिगत जीवन पर छींटाकशी करने से भी नहीं चूकती थीं.
उसके ठहाके उन्हें रत्ती भर भी नहीं सुहाते थे. प्रतिक्रियास्वरूप वे बुरा सा मुहं बनाकर आपस में कहतीं, "जाने इस लड़की को कब समझ आएगी ?
"घूमते-घुमाते ये सब बातें सलमा के कानों तक पहुँच जातीं. लेकिन वह एक कान से सुनकर दूसरे कान से निकाल देती. स्कूल की राजनीति से उसे कुछ लेना देना नहीं था.
सलमा भाग्य में बहुत विश्वास रखती थी.उसका कहना होता था कि हम भाग्य के अनुसार कर्म करते हैं. जबकि विभा की सोच ठीक इसके विपरीत थी. दोनों में इस विषय को लेकर बहस भी हो जाती थी. लेकिन सलमा अपनी बात इस विश्वास के साथ कहती थी कि विभा के पास चुप रहने के अतिरिक्त कोई चारा नहीं होता था.
साथ रहते हुए सलमा की बातों से तथा उसके रख-रखाव से विभा को आभास हुआ कि उसको एक सुन्दर से राजकुमार की बेसब्री से प्रतीक्षा है. अपने वैवाहिक जीवन को लेकर उसने कुछ सपने भी बुन रखे थे. एक बार स्टाफ रूम में चर्चा हो रही थी कि कोइ दसवीं की छात्रा किसी लड़के के साथ भाग गयी है. इसके प्रतिक्रियास्वरूप सलमा बोली, "यार, हमें कोई भगाने वाला नहीं मिलता ,हम भी भागने को तैयार हैं." यह सुनकर अध्यापिकाएं हँसते-हँसते लोट-पोट हो गईं. ऐसी थी सलमा.
जुड़वां बहन के विवाह को पांच साल बीत गए. स्टाफ रूम सलमा के विवाह को लेकर खुसर फुसर होने लगी. कभी कोई अध्यापिका सलमा से पूछती, "भई मिठाई कब खिला रही हो ? " तो वह बड़े तटस्थ भाव से माथे पर ऊंगली रख कर बोलती ," मैम,जब नसीब में होगा."
समय बीतता गया.लेकिन सलमा के चेहरे से उसके विवाह को लेकर कोई निराशा का भाव नहीं झलकता था. वह अपने रख-रखाव में पूर्ववत जागरूक थी. उसके ठहाकों में भी कोई अंतर नहीं आया.
एक दिन अचानक सलमा की मां का हार्ट अटैक से देहांत हो गया. विभा जब उससे मिलने गयी तो वह उससे लिपट कर फूट फूट कर रोने लगी. विभा को समझ नहीं आ रहा था कि वह उसको क्या कह कर उसकी हिम्मत बढ़ाए. अचानक उसके दिमाग में एक विचार आया, और बोली," तूं तो भाग्य में विश्वास रखती है न ? तेरे भाग्य में तेरी मां का साथ इतने दिनों का ही था." सुनते ही उसकी आँखों में चमक आ गयी और उस ने हाँ में सर हिला दिया.
दसपंद्रह दिन सलमा स्कूल में बहुत उदास रही. उसको देख कर लगता था कि शायद अब कभी उसके ठहाके सुनने को नहीं मिलेंगे. वह चुप-चाप अपने कम में लगी रहती थी. उसको देख कर कुछ हितैषी अध्यापिकाएं आपस में बात करतीं, "जाने, सलमा की हंसी को किसकी नज़र लग गयी ? अभी तो मां का रिटायरमेंट भी नहीं हुआ था. "फिर कुछ अध्यापिकाओं का नाम लेकर मुहं बिचका लेतीं.
लेकिन समय बहुत बड़ा मरहम है. वह बड़े से बड़ा घाव भी भर देता है. धीरे धीरे सलमा अपने पुराने रूप में आने लगी. फिर से उसके कहकहे गूंजने लगे. देख कर लगता ही नहीं था कि उसके जीवन में कोई कमी भी है. धीरे -धीरे समय बीतता गया. लेकिन उसके जीवन में कोई परिवर्तन नहीं आया. अध्यापिकाएं उसकी उम्र को लेकर अटकलें लगाती रहतीं थीं. उनके अनुमान से उसकी उम्र चालीस साल के लगभग होनी चाहिए थी. लेकिन अभी भी उसके विवाह को लेकर कोई चर्चा होती तो उसका चेहरा नवयौवना की तरह लाल हो जाता था. जाने किस मिट्टी की बनी थी सलमा?
विभा के पति जब रिटायर हो गए तो उसने दिल्ली में अपने बच्चों के साथ रहने का विचार बनाया. इसके लिए उसको स्कूल की नौकरी छोड़नी पडी. उसको सलमा का साथ छूटने का बहुत दुःख हो रहा था. लेकिन सलमा तटस्थ ही रही. शायाद उसे मिलने बिछुड़ने की आदत सी पड़ गयी थी.
दिल्ली में रहते हुए अक्सर विभा की सलमा से फोने पर बात-चीत होती रहती थी. लेकिन एक साल बाद ही यह सिलसिला होली, ईद तक सिमट कर रह गया. क्योंकि यह कोशिश एकतरफा विभा की तरफ से ही थी. लेकिन अन्य अध्यापिकाओं से उसके हाल चाल मिलते रहते थे.
एक दिन अचानक एक अध्यापिका का विभा के पास फ़ोन आया,"विभा! एक बुरी खबर है ,सलमा अपनी बहन के परिवार के साथ कार में गाजियाबाद से बरेली आ रही थी. रास्ते में उनकी कार की टक्कर एक ट्रक से हो गई. बहनकी मृत्यु तो दुर्घटनास्थल पर ही हो गई. सलमा तथा उसके जीजू को काफी चोटें आई हैं. बहन के दोनों बच्चे बाल-बाल बच गए.
" हे ! भगवान् ! " उसके मुहं से निकला.वह सन्न रह गई, माथा पकड़ कर बैठ गई. उसके दिमाग में उथल- पुथल होने लगी. "तो क्या विधाता ने दोनों बहनों के लिए एक ही वर रचा है? क्या इसीलिये वह अब तक कुंवारी थी ?" विभा बुदबुदा रही थी.
एक हफ्ते बाद विभा ने सलमा से बात करने की हिम्मत जुटाई. उसने उसको वही भाग्य की दुहाई दी. इससे अधिक कोई तर्क उसको तसल्ली नहीं दे सकता था, यह वह अच्छी तरह जानती थी. सलमा की उधर से उदास सी आवाज़ आई, "मैम, मेरा भाई मेरा निकाह मेरे जीजू से करना चाहता है, मुझे क्या करना चाहिए ? " विभा ने उत्तर दिया , "देख! सोच समझ कर निर्णय लेना, अपने जीवन के बारे में सोचना. किसी प्रकार का समझौता मत करना. "पहली बार सलमा ने विभा से सलाह ली थी. विभा ने कह तो दिया, लेकिन फ़ोन रखने के बाद उसको अपनी सोच बड़ी खोखली लगी. कहते हैं जोड़े ऊपर से बन कर आते हैं. तो क्या विधाता की योजना के अनुसार ही सलमा की बहन की मृत्यु दुर्घटना में हुई थी? इसमें चालक की कोई गलती नहीं थी? यह दुर्घटना भगवन ने ही करवाई थी? उसे लगा भाग्य और कर्म के विवाद में सलमा उससे जीत गई. विभा के दिमाग ने जैसे काम करना ही बंद कर दिया था.
एक हफ्ते बाद विभा ने सलमा से बात करने की हिम्मत जुटाई. उसने उसको वही भाग्य की दुहाई दी. इससे अधिक कोई तर्क उसको तसल्ली नहीं दे सकता था, यह वह अच्छी तरह जानती थी. सलमा की उधर से उदास सी आवाज़ आई, "मैम, मेरा भाई मेरा निकाह मेरे जीजू से करना चाहता है, मुझे क्या करना चाहिए ? " विभा ने उत्तर दिया , "देख! सोच समझ कर निर्णय लेना, अपने जीवन के बारे में सोचना. किसी प्रकार का समझौता मत करना. "पहली बार सलमा ने विभा से सलाह ली थी. विभा ने कह तो दिया, लेकिन फ़ोन रखने के बाद उसको अपनी सोच बड़ी खोखली लगी. कहते हैं जोड़े ऊपर से बन कर आते हैं. तो क्या विधाता की योजना के अनुसार ही सलमा की बहन की मृत्यु दुर्घटना में हुई थी? इसमें चालक की कोई गलती नहीं थी? यह दुर्घटना भगवन ने ही करवाई थी? उसे लगा भाग्य और कर्म के विवाद में सलमा उससे जीत गई. विभा के दिमाग ने जैसे काम करना ही बंद कर दिया था.
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